‘राष्ट्र सबसे पहले’ का संदेश

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान दिवस पर अपने उद्बोधन में महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। उन्होंने अपने भाषण में ‘राष्ट्र सबसे पहले’ की भावना जगाने का आह्वान किया। हम सब जानते हैं कि भारत का संविधान बहुत लंबी प्रक्रिया और गहन विमर्श के बाद साकार रूप में आया। संविधान सभा में अनेक मुद्दों पर बहस के दौरान एक बात सब ध्यान रखते थे कि हम एक राष्ट्र का श्रेष्ठ संविधान बनाने के लिए विमर्श कर रहे हैं। व्यक्तिगत या वैचारिक हितों से ऊपर उठकर देशहित के लिए एकमत होना संविधान सभा के सदस्यों का लक्ष्य था।

प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही कहा कि ”आज शायद ही हम संविधान का एक पृष्ठ भी पूरा न लिख पाते, क्योंकि राजनीति के चलते राष्ट्र सबसे पहले और देशहित पीछे छूट जाता है। चाहे पीडि़त हिन्दुओं को स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार देने के लिए लाया गया ‘नागरिकता संशोधन कानून हो या फिर कृषि सुधारों के लिए लाए गए ऐतिहासिक कानून, हमने देखा कि सिर्फ अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए इन कानूनों का विरोध किया गया। दोनों ही कानूनों को लेकर विपक्ष ने देश का वातावरण बिगाडऩे का प्रयत्न किया।

कृषि कानूनों की आड़ में जिस प्रकार की अराजक ताकतें सक्रिय हो रही थीं, उसे देखकर सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े। इस निर्णय से देश के 86 प्रतिशत से अधिक किसानों का नुकसान हुआ है। लेकिन, राजनीतिक क्षुद्रता के कारण यह बड़ा नुकसान विपक्षी राजनीतिक दलों को दिखाई नहीं दे रहा है। लोकतंत्र के लिए इस अराजकता को प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने खतरनाक बताया था। संविधान बनने के बाद, संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में बाबा साहब ने इस खतरे की ओर संकेत किया था। उन्होंने कहा कि ”संविधान की निंदा मुख्य रूप से दो दलों द्वारा की जा रही है- कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी।

कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है। वे संविधान की निंदा इसलिए करते हैं कि वह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, सोशलिस्ट चाहते हैं कि संविधान में दिए गए मूलभत अधिकार असीमित होने चाहिए, ताकि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आने में असफल रहती है तो उन्हें इस बात की आजादी हो कि वे न केवल राज्य की निंदा कर सकें, बल्कि उसे उखाड़ फेंकें। 1949 में जो आशंका बाबा साहब ने व्यक्त की थी, वह आज हमें दिखाई दे रही है।

अगर हमें भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाना है, तब हमें तानाशाही और अराजक मानसिकता को पहचानना और उससे लडऩा होगा। संविधान दिवस मनाने का वास्तविक उद्देश्य भी तभी पूरा हो सकता है जब हम यह समझ पाएं कि वास्तव में ‘संविधान विरोधी कौन है? देशभक्त नागरिकों को यह संकल्प लेना चाहिए कि जो भी राष्ट्र सबसे पहले की भावना को प्रगाढ़ करेगा, यह देश उसके साथ खड़ा होगा।

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