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भारत का संदेश

उचित मंच से भारतहित की बात कहने में अब भारत चूकता नहीं है अपितु आगे बढ़कर दुनिया को स्पष्ट संदेश देता है। इस वर्ष भारत जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है। इसी तारतम्य में देशभर में जी-20 की बैठकें आयोजित हो रही हैं। पिछले दिनों जी-20 की एक बैठक जम्मू-कश्मीर में सम्पन्न हुई, जिसे लेकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चा हुई। इस चर्चा के बीच भारत ने साफ संदेश दे दिया है कि जम्मू-कश्मीर का प्रत्येक भौगोलिक हिस्सा भारत का है और यह भारत की संप्रभुता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। इससे पहले लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी जी-20 की बैठकें आयोजित करके भारत ने यही संदेश चीन सहित अन्य देशों को दिया। भारत चाहता तो लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश की जगह अन्य प्रदेशों में ही जी-20 की सभी बैठकें सम्पन्न कर सकता था लेकिन अपनी सीमाओं को लेकर जो कूटनीतिक संदेश भारत दुनिया को देना चाहता था, उसके लिए यह आवश्यक कदम था। हालांकि जम्मू-कश्मीर में सम्पन्न हुई जी-20 समूह के पर्यटन के कार्यकारी समूह की बैठक में चार देशों (चीन, तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र) के प्रतिनिधियों के आधिकारिक रूप से शामिल नहीं होने की बड़ी चर्चा हुई। परंतु एक तथ्य यह भी ध्यान रखना चाहिए कि श्रीनगर में आयोजित जी-20 समूह की बैठक उपस्थिति की दृष्टिकोण से भी सबसे अधिक सफल रही है। इस बैठक में सबसे अधिक विदेशी प्रतिनिधि उपस्थित रहे। संभव है कि पर्यटन पर केंद्रित इस बैठक में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि इसलिए भी बड़ी संख्या में पहुँचे क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का प्रमुख पर्यटन केंद्र है। जम्मू-कश्मीर को लेकर दुनिया भर के पर्यटकों में विशेष आकर्षण रहता है। इधर, मोदी सरकार ने भी विभाजनकारी अनुच्छेद 370 और 35ए को निष्प्रभावी करने के बाद से जम्मू-कश्मीर में विकास कार्यों को बढ़ावा देने के साथ ही पर्यटन गतिविधियों को भी बल दिया है। मोदी सरकार के प्रयासों से जम्मू-कश्मीर में विकास की लहर चल रही है। कश्मीर का वातावरण बदलता हुआ दिखायी दे रहा है। श्रीनगर के जिस लालचौक पर राष्ट्रध्वज फहराना चुनौतीपूर्ण होता था, आज वहाँ जी-20 के प्रतिनिधि भी सहज रूप से होकर आए। अपनी कथित भारत जोड़ा यात्रा में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी उत्साहपूर्वक लालचौक पर तिरंगा फहरा सके और कश्मीर की वादियों में बर्फबारी का आनंद ले सके। जम्मू-कश्मीर की इस बदली हुई तस्वीर के लिए मोदी सरकार को श्रेय देने में संकोच नहीं करना चाहिए। अब बात करते हैं चीन, तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र देश के प्रतिनिधि के इस आयोजन में भाग नहीं लेने की, तो इसे देखने के और भी दृष्टिकोण हैं। भले ही इन देशों के आधिकारिक प्रतिनिधियों ने भागीदारी न की हो, लेकिन इन देशों के निजी पर्यटन गतिविधियों के संचालक बैठक में शामिल रहे। हम जानते हैं कि कुछ मुद्दों को लेकर चीन, तुर्की और सऊदी अरब का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहता है। अपने निहित स्वार्थों की वजह से भले ही इन देशों ने यह कदम उठाया हो लेकिन यह देश भी पाकिस्तान की स्थिति से परिचित ही है। ये देश यह भी जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान ने अवैध ढंग से अपने कब्जे में ले रखा है, वह हिस्सा किस हद तक बदहाल है। वहाँ के नागरिक पाकिस्तान के विरोध में खड़े हो रहे हैं। अच्छा ही हुआ इन देशों के इस कदम के कारण यह सच भी दुनिया के सामने आ गया। बहरहाल, हमें यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक बैठक में सब देशों के प्रतिनिधि आ पाएं यह संभव भी नहीं है। पूर्व में भी अनेक देशों के प्रतिनिधि अन्य बैठकों में शामिल नहीं हो सके हैं। यह भारत की कूटनीतिक जीत है कि वह जो कहना चाहता है, नि:संकोच कह देता है, फिर भले ही कुछ देश अपने निहित स्वार्थों के साथ चिपके रहें। जी-20 समूह की बैठकें कहाँ होनी चाहिए और कहाँ नहीं, यह भारत तय करेगा। भारत अपनी संप्रभुता वाले किसी भी क्षेत्र में इस प्रकार के आयोजन करने के लिए स्वतंत्र और समर्थ है।

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