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संदेशखाली पर घिरी ममता सरकार

एक बार फिर ममता बनर्जी की सरकार को न्यायालय ने आईना दिखाया है। संदेशखाली के मामले में न्यायालय ने ममता बनर्जी की सरकार को आड़े हाथ लिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिलाओं की अस्मिता से जुड़े मामले में महिला होकर भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उदासीनता दिखायी है। आरोपी शाहजहाँ शेख को गिरफ्तार करना तो दूर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब तक उसके खिलाफ एक शब्द नहीं कहा है। जबकि संदेशखाली की पीिड़त महिलाएं अब तो खुलकर सामने भी आ गईं। अपना सबकुछ दांव पर लगाकर ये महिलाएं लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन उनकी मुख्यमंत्री न जाने कहाँ चुप्पी साधकर बैठ गई हैं। भले ही न्यायालय ने ममता सरकार को फटकार लगाते हुए शाहजहाँ शेख को गिरफ्तार करने का आदेश दिया है परंतु ममता सरकार कार्रवाई करेगी, इसकी संभावना दिख नहीं रही है। परंतु इतना तय है कि संदेशखाली से आ रहा हिंदू महिलाओं का पीड़ित स्वर ममता सरकार के पतन का कारण बनेगा। याद रखें कि महाभारत में जब द्रोपदी की अस्मिता पर कौरवों के हाथ उठे तो शक्तिशाली साम्राज्य ध्वस्त हो गया। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के अपराधों का घड़ा भी अब भरने को है। तथाकथित सेकुलर ताकतों की चुप्पी भी उनके पाखंड को उजागर कर रही है। वे इसलिए चुप है कि ममता सरकार के खिलाफ बोलेंगे तो उसका लाभ लोकसभा चुनाव में भाजपा को न मिल जाए। तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के कारण कई नेताओं की जुबान पर ताला लग गया है। भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी इस मामले में मुखर नहीं हो रहे। क्या संदेशखाली की हिंदू महिलाओं की चीख–पुकार राहुल गांधी के कानों तक नहीं पहुंच रही है? बहरहाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह समझ लेना चाहिए कि संदेशखाली में उनका निरंकुश व्यवहार, उनकी राजनीति पर बहुत भारी पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषक स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि लोकसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए संदेशखाली हिंसा का प्रकरण बड़ी मुसीबत बनेगा। जिस तरह से राज्य सरकार भाजपा सहित नागरिक समुदाय को संदेशखाली जाने से रोक रही है, उससे जाहिर होता है कि ममता सरकार शाहजहां शेख को संरक्षण दे रही है। सरकार यहां तक लोकतंत्र का गला दबा रही है कि भाजपा को कोलकाता में भी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। यह अच्छी बात है कि भाजपा ने इस मुद्दे को जबरदस्त ढंग से उठाया है। इसी कारण संदेशखाली का सच समाज के सामने आ सका है। न्यायालय के सख्ती दिखाने के साथ ही राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने भी कह दिया है कि यदि सरकार कार्रवाई नहीं करेगी तो उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ेगा। नि:संदेह, राज्यपाल का काम यह देखना है कि सरकार नियमों के तहत कब कार्रवाई करती है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो राज्यपाल को हस्तक्षेप करना ही चाहिए। संविधान, कानून और मौलिक अधिकारों को सुरक्षा करना आवश्यक है। संदेशखाली मामले में अब न्याय की उम्मीद न्यायालय से ही है। केंद्र सरकार को भी हस्तक्षेप करने में अधिक विलंब नहीं करना चाहिए।

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