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अमेरिका की संसद में भारत का पक्ष

यह नये भारत के प्रति वैश्विक शक्तियों का बदलता दृष्टिकोण है कि उनके द्वारा भारत के पक्ष में खुलकर अपना मत व्यक्त किया जा रहा है। इसके साथ ही भारत के प्रति बैर भाव रखने का परिणाम है कि पाकिस्तान की तरह अब चीन भी दुनिया में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। भारत के दृष्टिकोण से अमेरिकी संसद में एक बहुत महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया है। अमेरिका की संसद ने भारत और चीन के बीच मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता दी है। अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट में लाए प्रस्ताव में अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए चीन की आक्रामकता के खिलाफ भारत का समर्थन दोहराया गया है। अमेरिकी संसद में पारित हुआ यह प्रस्ताव चीन की विस्तारवादी और अतिक्रमणकारी मानसिकता की पराजय है। अंतरराष्ट्रीय पटल पर इस घटना से चीन की छवि पड़ोसी देशों के साथ विवाद करने और उनकी जमीन पर कब्जा करनेवाले देश के रूप में बनेगी और यह भी संदेश जाएगा कि चीन एक शांतिप्रिय देश नहीं है बल्कि उसके व्यवहार में आक्रामकता है। यानी चीन को सहयोग करना विश्व शांति के लिए खतरा हो सकता है। जबकि इस घटना ने भारत की साख को सब प्रकार से बढ़ा दिया है। उल्लेखनीय है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन लगातार जमीन कब्जाने की हरकतें करता रहता है। इसको लेकर भारत चीन के सामने अड़ गया है। चीन को उसकी हद में रखने के लिए भारत ने सैन्य जमावट से लेकर कूटनीति मोर्चाबंदी कर दी है। भारत की कूटनीति का ही परिणाम है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े देशों का साथ मिलना बंद हो गया है। चीन ने पाकिस्तान के आतंकियों को बचाने के भी प्रयास किए लेकिन वहां भी उसके साथ कोई खड़ा नहीं हुआ, बल्कि आतंकियों का मददगार बनने पर उसकी जमकर आलोचना हुई। अंतत: जीत भारत की हुई, पाकिस्तान के कुख्यात आतंकी वैश्विक आतंकी घोषित हुए। यही हाल अब चीन का अरुणाचल प्रदेश पर जबरदस्ती के दावे को लेकर हुआ है। अमेरिकी संसद में उसके इस दावे के पक्ष में कोई खड़ा नहीं हुआ। दरअसल, चीन को लगता है कि जिस प्रकार उसने 1962 में भारत की बहुत बड़ी जमीन दबा ली, वैसे ही अब भी अतिक्रमण कर लेगा, तो यह उसकी भूल है। आज का भारत 1962 की सोच से बिल्कुल अलग है। उस समय के नेतृत्व ने आंख बंद करके धोखेबाज चीन पर भरोसा किया था जबकि वर्तमान नेतृत्व पड़ोसी देश होने के कारण संबंध मधुर रखने का हिमायती है लेकिन यह एकतरफा नहीं होना चाहिए। दोनों देशों के बीच संबंध मित्रतापूर्ण रहेंगे, तो दोनों ही देशों का भला होगा। इसलिए भारत मित्रता तो रखना चाहता है लेकिन आंख बंद करके नहीं। अमेरिकी संसद में इस प्रस्ताव को पारित करते समय खुलकर चीन की मानसिकता की निंदा की गई। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बदलने के लिए चीन के सैन्य शक्ति उपयोग के प्रयास, विवादित क्षेत्रों में गांव बसाने, अरुणाचल प्रदेश के भारतीय शहरों के मंदारिन भाषा में नक्शे जारी करने और भूटान तक अपने क्षेत्रीय दावे को बढ़ाने की भी प्रस्ताव में निंदा की गई। वहीं, भारत की नीतियों की सराहना करते हुए भारत के साथ सहयोग बढ़ाने और भारत के हितों के साथ खड़े होने पर भी सहमति बनी है। यह सब विश्व पटल पर भारत के बढ़ते कद और भारत की विदेश नीति का कमाल है। बहरहाल, भारत और चीन दोनों के लिए अच्छा होगा कि चीन वास्तविकता को स्वीकार करे और अपने बेकार के दावों को छोड़कर भारत के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों की नयी शुरुआत करें।

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