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न्यायालय का भारतीयकरण

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जब हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तब हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि अंग्रेजों की दृष्टि से बनाई कितनी ही ‘अव्यवस्थाओं को हम क्यों ढो रहे हैं? निश्चित ही अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था को लेकर गंभीरता से मूल्यांकन होना चाहिए।

भारत की न्याय व्यवस्था के प्रति देश में सम्मान और श्रद्धा का भाव है। किसी भी आदर्श शासन व्यवस्था के लिए यह होना भी चाहिए कि वहाँ के नागरिक न्यायपालिका पर विश्वास रखें। अन्याय होने की स्थिति में सामान्य व्यक्ति न्यायालय की ओर ही देखता है। भारतीय न्यायपालिका के प्रति अत्यंत श्रद्धा होने के बाद भी एक प्रश्न बार-बार उठता है कि हमारे यहाँ न्याय की प्रक्रिया बहुत धीमी है। इस कारण अनेक लोगों को न्याय नहीं मिल पाता। न्याय की आस में उनकी उम्र बीत जाती है। अनेक निरपराध लोगों का जीवन जेल में बीत जाता है। जब उन्हें उनके पक्ष में निर्णय आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

हमारे यहाँ तो कहा भी जाता है कि देरी से मिला न्याय भी अन्याय की श्रेणी में आता है। वर्षों से यह बात जोर-शोर के साथ उठाई जाती रही है कि भारतीय न्याय प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता है। अब यह प्रश्न भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने ही उठाया है। उन्होंने न्यायिक प्रणाली में कमियों को रेखांकित करते हुए कहा है कि हमारी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के दौर की है। इसका भारतीयकरण करना बहुत जरूरी है। याद रखें कि अंग्रेजों ने ज्यादातर व्यवस्थाएं, नियम और कानून अपने हितों को साधने के लिए बनाए थे। इसलिए उनमें बदलाव आवश्यक है। आज जब हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तब हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि अंग्रेजों की दृष्टि से बनाई कितनी ही ‘अव्यवस्थाओं को हम क्यों ढो रहे हैं? निश्चित ही अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था को लेकर गंभीरता से मूल्यांकन होना चाहिए। हमें अपनी व्यवस्थाएं अपने संविधान एवं दृष्टि के अनुकूल बनानी ही चाहिए।

न्यायपालिका में जो भी विसंगतियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए न्यायमूर्तियों को ही पहल करनी होगी। क्योंकि यह कार्य सरकार की ओर से किया जाएगा, तब विपक्षी राजनीतिक दल एवं अतिवादी बुद्धिजीवी अनावश्यक विवाद खड़ा करेंगे। उनकी ओर से अच्छी पहल को यह कहकर बदनाम किया जाएगा कि सरकार न्याय व्यवस्था पर कब्जा करना चाहती है। वे यह भी कहेंगे कि भाजपा सरकार न्यायपालिका का ‘भगवाकरण कर रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी भी व्यवस्था को भारतीय मूल्यों के प्रकाश में देखने पर ‘भगवाकरण का वितंडावाद खड़ा किया जाता है।

यह तो अच्छा हुआ कि न्याय व्यवस्था के ‘भारतीयकरण की बात भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कही है। अन्यथा अब तक इस बात पर हो-हल्ला शुरू हो चुका होता। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमना ने उचित ही कहा है कि हमारी न्याय व्यवस्था में आम लोगों को न्याय पाने में कई अड़चने आती हैं। हमारी अदालतों की कार्यप्रणाली भारत की जटिलता के साथ मेल नहीं खाती। आवश्यकता है कि हम समाज की वास्तविकता को स्वीकार करें और न्याय व्यवस्था को जरूरतों के हिसाब से ढालें। गांव का कोई परिवार अपना झगड़ा सुलझाने के लिए न्यायालय में आता है तो तालमेल नहीं बिठा पाता। इस संदर्भ में राजभाषा दिवस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हिन्दी में निर्णय देकर एक संदेश दिया है। ऐसी उनके पहल हैं, जो होनी चाहिए। विश्वास है कि न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग मुख्य न्यायाधीश के विचार के क्रियान्वयन में ठोस पहल करेंगे।

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