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तुषिटकरण की राजनीति पर हो चोट

भारत ने लंबे समय तक तुषिटकरण की राजनीति का दंश भोगा है। विशेषकर मुस्लिम तुष्िटकरण के कारण देश का विकास बाधित रहा है। नीतियों पर तुष्िटकरण की राजनीति की छाया बनी रही, जिसके कारण पूर्ववर्ती सरकारें समग्रता को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं लेती थी। यहाँ तक कि विदेश नीति भी तुष्िटकरण के कारण प्रभावित रही। याद हो कि हमारे पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री फिलिस्तीन तक तो जाते थे लेकिन कभी इजराइल नहीं गए क्योंकि उन्हें लगता था कि इजराइल के साथ मित्रता प्रकट करने से देश-दुनिया का मुसलमान नाराज हो जाएगा। वहीं, जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, तब वे पहली बार अपने स्वाभाविक मित्र देश इजराइल गए और फिलिस्तीन के साथ भी अपने संबंधों को बनाए रखा। वास्तव में एक स्वतंत्र देश की नीति ऐसी ही होनी चाहिए कि वह सबको साथ लेकर चले। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में अस्थायी अनुच्छेद-370 और 35ए को वर्षों तक इसलिए बनाए रखा गया क्योंकि कांग्रेसनीत सरकारों को लगता था कि इसे हटाने से मुस्लिम वर्ग नाराज हो जाएगा और उसका वोटबैंक छिटक जाएगा। वह तो भला हो कि देश की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत दे दिया, जो तुष्िटकरण की राजनीति का विरोध करती है। देश के जनादेश की ताकत पर ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने विभाजनकारी अनुच्छेद-370 और शोषणकारी प्रावधान 35ए को निष्प्रभावी कर दिया। आज जम्मू-कश्मीर भी शेष राज्यों की भाँति विकास की मुख्यधारा में शामिल हो गया है। वहाँ के नागरिक भी अकसर मोदी सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते नजर आते हैं। याद रखें कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 का प्रावधान भी तुष्िटकरण की राजनीति के कारण ही रखा गया था जबकि सरदार पटेल ने जब सभी रियासतों को विलय भारत में कराया तो किसी को इस प्रकार के विशेष प्रावधान नहीं दिए। चूँकि जम्मू-कश्मीर के मामले को उनसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ले लिया था। राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह कहा है कि “तुष्िटकरण की राजनीति देश की एकता और विकास यात्रा में सबसे बड़ी रुकावट है। भारत के बीते कई दशक साक्षी हैं कि तुष्टिकरण करने वालों को आतंकवाद, उसकी भयानकता, विकरालता कभी दिखाई नहीं देती। तुष्टिकरण करने वालों को मानवता के दुश्मनों के साथ खड़े होने में भी संकोच नहीं हो रहा है। तुष्टिकरण की ये सोच इतनी खतरनाक है कि वो आतंकियों को बचाने के लिए अदालत तक पहुंच जाते हैं। एकता को खतरे में डालने वाली ऐसी सोच से हर पल, हर समय, हर देशवासी को सावधान रहना ही है”। अपने इस वक्तव्य में उन्होंने उन अर्बन नक्सलों की ओर संकेत किया है, जो अफजल गुरु जैसे आतंकियों की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में भी संकोच नहीं करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत में उन लोगों एवं दलों को भी कठघरे में खड़ा किया है, जो आतंकवादी गिरोह हमास के समर्थन में हैं और इजराइल के विरोध में सभाएं एवं रैलियां आयोजित कर रहे हैं। उनका प्रश्न किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का प्रश्न है कि आखिर कैसे कोई तुष्िटकरण के लिए मानवता के दुश्मनों के पाले में खड़े हो सकता है। यकीनन तुष्िटकरण की यह सोच बहुत खतरनाथ है। देश की जनता को इस प्रकार की मानसिकता रखनेवाले लोगों को सदैव सचेत रहना चाहिए। निर्वाचन के समय जनता के पास अवसर आता है कि वह तुष्िटकरण की राजनीति करनेवाले राजनीति दलों एवं नेताओं के विरुद्ध मतदान करके उन्हें लोकतंत्र से बाहर का रास्ता दिखाएं। तुष्िटकरण की राजनीति करनेवालों का बस चले तो वे देश के संसाधनों पर पहला अधिकार खास संप्रदाय को ही दे दें। इस संबंध में कांग्रेस के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के विचार अकसर उल्लेखित किए ही जाते हैं, जिनमें उन्होंने कह दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। उनके इस वक्तव्य का देश में भारी विरोध हुआ और इस घनघोर तुष्िटकरण की कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ गई थी। जनता तुष्िटकरण की राजनीति को पूरी तरह खारिज कर चुकी है।

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