Home संपादकीय कितना उचित है फर्जी मामले पर संसद का समय बर्बाद करना?

कितना उचित है फर्जी मामले पर संसद का समय बर्बाद करना?

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पेगासस जासूसी मामले के संबंध में पूरी क्रॉनोलॉजी को देखें तो यह साफ पता चलता है कि इसका उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट और उनके साथियों ने योजनापूर्वक संसद की कार्यवाही को बर्बाद करने और मोदी सरकार को घेरने के लिए किया है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की सर्वोच्च पंचायत ‘संसद’ के मानसून सत्र के शुरुआती दो दिन ऐसे मुद्दे को लेकर हंगामे की भेंट चढ़ गया, जिसको लेकर हवा-हवाई बातें ज्यादा हैं और तथ्य कम। पेगासस जासूसी मामले के संबंध में पूरी क्रॉनोलॉजी को देखें तो यह साफ पता चलता है कि इसका उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट और उनके साथियों ने योजनापूर्वक संसद की कार्यवाही को बर्बाद करने और मोदी सरकार को घेरने के लिए किया है। एक ऐसे वेबसाइट ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया, जिस पर फेक न्यूज फैलाने के मामले चल रहे हैं।

संबंधित वेबसाइट का संस्थापक संपादक अकसर फर्जी खबरें प्रसारित करते हुए पाया गया है। ऐसी ही स्थिति इस तथाकथित खुलासे से जुड़ी संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ऐसी संस्था, जिसने भारत में अपना कार्यालय इसलिए बंद कर दिया क्योंकि वह पारदर्शिता नहीं चाहती थी। सरकार ने एमनेस्टी से जब कहा कि वह विदेश से प्राप्त धन के उपयोग की जानकारी दे, तो एमनेस्टी ने यह बताने की अपेक्षा अपना कामकाज ही भारत से समेटना उचित समझा। यानी कि एमनेस्टी यह नहीं बताना चाहती थी कि वह विदेश से प्राप्त पैसे का उपयोग भारत में किस तरह कर रही है। जो संस्था स्वयं ही पारदर्शिता की विरोधी है, जो महत्वपूर्ण बातों को छिपाने में भरोसा रखती हो, उसका यह तथाकथित खुलासा स्वत: ही संदिग्ध है। दूसरी बात यह है कि इस पूरी रिपोर्ट में सौ प्रतिशत दावा भी इस बात का नहीं किया गया है कि भारत सरकार ने तथाकथित 40 पत्रकारों, केंद्रीय मंत्रियों एवं विपक्ष के नेताओं के फोन की हैकिंग कराई है। रिपोर्ट में सभी बातें कयास के आधार पर कही गई हैं।

उल्लेखनीय है कि पेरिस स्थित एक मीडिया नॉन प्रॉफिट फॉरबिडेन स्टोरीज और ऐमनेस्टी इंटरनेशनल को विभिन्न देशों के ऐसे 50,000 फोन नंबरों की सूची मिली, जिनके बारे में संदेह है कि पेगासस स्पाईवेयर के जरिए उनकी हैकिंग कराई गई। हैकिंग की पुष्टी के लिए लगभग ५० फोन की ही फॉरेंसिक जाँच की गई है। यह फॉरेंसिक जाँच भी यह दावा नहीं करनी है कि सभी फोन की हैकिंग हुई थी। यानी पूरी कहानी ही बोगस नजर आ रही है। याद हो यह मुद्दा 2016 में भी उठा था, तब भी कोई भी इस बात को प्रमाणित नहीं कर सका।

पेगासस सॉफ्टवेयर बेचने वाली इजराइली कंपनी एनएसओ ने स्पष्ट किया है कि यह डेटा फर्जी है। उसने इस मामले में कानूनी कार्यवाही का मन भी बना लिया है। वहीं, भारत सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि उसने किसी के मोबाइल फोन की जासूसी पेगासस सॉफ्टवेयर के माध्यम से नहीं कराई है। यानी सब तथ्य एवं कथ्य यह कह रहे हैं कि यह मामला फर्जी है। लेकिन, इस बेतुके मुद्दे को लेकर देश की संसद का समय बर्बाद करने में विपक्ष को आनंद आ रहा है। विशेषकर कांग्रेस यह याद रखे कि फोन टेपिंग और जासूसी पर बहस होगी तो बात बहुत दूर तक जाएगी और इस मामले में कांग्रेस बुरी तरह रंगी-पुती नजर आएगी। भारतीय जनता पार्टी इस मामले में सक्रिय हो गई है।

जासूसी के मामले में कांग्रेस का सच सामने लाने की शुरुआत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की और उसके बाद अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री एवं नेता भी सामने आने लगे हैं। अच्छा होगा कि इस तरह के फर्जी मामलों पर राजनीति से सभी दल बचें। यदि मामले में जरा भी सच है तब विपक्ष को अधिक प्रमाणों के साथ बात रखनी चाहिए अन्यथा इस तरह के विषय उठाने से बचना चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं इस तरह के विमर्श अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत लोकतंत्र वाले देश भारत की छवि को धक्का पहुँचाते हैं।

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