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हिंदी स्वाभिमान की भाषा

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दुनिया सम्मान भी करेगी कि आप अपनी भाषा में संवाद करते हैं। अपनी भाषा से परहेज और अंग्रेजी भाषा से प्रेम के कारण भारत को कई बार अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है।

यह एक भ्रम है कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है। दुनिया से संवाद करने के लिए यह अनिवार्य भाषा नहीं है। दुनिया में तमाम देश हैं जहां बहुत पढ़े-लिखे लोग भी अंग्रेजी में अंगूठाछाप हैं, उन्हें अंग्रेजी की जरूरत भी नहीं है। अनेक अवसरों पर वैश्विक मंचों से हिन्दी में उद्बोधन देकर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह साबित करने का प्रयास किया है कि संवाद करने के लिए भाषा का कोई बंधन नहीं है। आप अपनी भाषा में बोलिए, लोग सुनेंगे और मानेंगे भी। दुनिया सम्मान भी करेगी कि आप अपनी भाषा में संवाद करते हैं। अपनी भाषा से परहेज और अंग्रेजी भाषा से प्रेम के कारण भारत को कई बार अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है।

विजयलक्ष्मी पण्डित जब राजदूत का पद ग्रहण करने रूस गईं थी तब अंग्रेजी में लिखे उनके परिचय-पत्र को स्तालिन ने उठाकर फेंक दिया था। स्तालिन ने विजयलक्ष्मी पण्डित से पूछा था कि क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है? दुनियाभर में तमाम देश हैं, जहां उनकी मातृभाषा ही संवाद और कामकाज की भाषा है। यहूदी तो अपनी भूमि-भाषा दोनों खो चुके थे लेकिन मातृभूमि और मातृभाषा से अटूट प्रेम का ही परिणाम था कि यहूदियों ने अपनी जमीन (इजराइल) भी वापस पाई और अपनी भाषा (हिब्रू) को भी जीवित किया। करीब सवा सौ साल पहले तक फिनलैंड के निवासी स्वीडी भाषा का इस्तेमाल करते थे लेकिन एक दिन उन्होंने तय किया कि अपनी भाषा को सम्मान देंगे। तभी से फिनी भाषा में वहां सारा कामकाज चल रहा है।

इसी तरह जार के जमाने में रूस में फ्रांसीसी भाषा का दबदबा था। लेकिन अब वहां रूसी भाषा सर्वोपरि है। शिक्षा, व्यापार, अनुसंधान-आविष्कार अपनी भाषा में संभव ही नहीं बल्कि अधिक सहज भी है, यह इन देशों ने साबित करके दिखा दिया है। लेकिन, स्वतंत्रता के ६० साल बाद तक भी अंग्रेजी के मोहपाश में फंसे हम भारतीय यह ही समझते रहे कि यही एकमात्र भाषा है जो हमारा कल्याण कर सकती है। वर्ष १९५९ में भारतीय संसद में एक दु:खद प्रकरण हुआ। संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अहिन्दी भाषी राज्यों को यह आश्वासन दे दिया कि जब तक ये राज्य चाहेंगे संघ के कार्यों में अंग्रेजी का रुतबा कायम रहेगा। अपनी भाषा को स्थापित करने की जगह हमने स्वार्थों और वोट बैंक की दूषित राजनीति के कारण भाषाई विवाद खड़े कर दिए।

आपसी झगड़े के कारण अंग्रेजी धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं के माथे पर चढ़ गई और उनके वजूद के लिए खतरा बन गई है। मजबूत इरादों वाले नरेन्द्र मोदी से उम्मीद है कि वे राजभाषा में संसोधन कराएंगे और हिन्दी को उसका हक दिलाएंगे। हिन्दी को सिंहासन पर बैठाने के लिए आम सहमति बनाने के लिए भी नरेन्द्र मोदी प्रयास करेंगे, ऐसी उनसे उम्मीद है, वे यह कर सकते हैं। यह स्पष्ट कर देना उचित है कि अंग्रेजी से किसी को दिक्कत नहीं है। भाषाएं जितनी भी सीखी जाएं, अच्छा ही है। दिक्कत तो अंग्रेजियत से है। अंग्रेजी भाषा के साथ जो अंग्रेजियत जुड़ी है, उससे सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।

महज दो प्रतिशत अंग्रेजी बोलने वाले अंग्रेजीदां लोगों के कारण अन्य भारतीयों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। सरकार-व्यवस्था में इन अंग्रेजीदां लोगों का वर्चस्व है। काले अंग्रेजों ने अंग्रेजी को इतना महिमामंडित कर रखा है कि हिन्दी अपने ही देश में दोयम दर्जे की भाषा हो गई है। इस हिन्दी दिवस पर हम सबको संकल्प लेना होगा कि हिन्दी का स्वाभिमान बढ़ाएंगे। हम मिलकर इस बात का प्रयास करेंगे कि भारतीय भाषाओं और उन्हें जीने वाले देसी लोगों को अंग्रेजी के आगे झुकना नहीं पड़े, अंग्रेजी के कारण रुकना नहीं पड़े और अंग्रेजी के कारण शर्मिंदा नहीं होना पड़े।

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