तिरंगे पर फिजूल विवाद

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इसे कांग्रेस नेतृत्व का मानसिक दिवालियापन ही कहा जायेगा कि वह स्वतंत्रता अमृत महोत्सव के अंतर्गत ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के सन्दर्भ में राष्ट्रध्वज ‘तिरंगा’ को लेकर व्यर्थ का विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर शुरू हुए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का सीधा विरोध करने की स्थिति में नहीं होने पर कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से देशाभिमान जगाने वाले इस अभियान को लक्षित किया है। कांग्रेस ने हर घर तिरंगा अभियान को सीधे समर्थन न देकर इधर-उधर के प्रश्न उठाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यह बात बार-बार राजनीतिक विश्लेषक कहते आ रहे हैं कि कुछ मुद्दे राजनीति के लिए नहीं होते हैं। राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों का सिर्फ समर्थन किया जा सकता है। लेकिन यह एक साधारण बात कांग्रेस को समझ नहीं आती, वह सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर हर घर तिरंगा अभियान तक अतार्किक बहस प्रारंभ कर देती है और फिर उस बहस में खुद ही उलझ जाती है। प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल में तिरंगा का चित्र लगाने का आह्वान किया। एक ओर समूचे देश में बड़ी संख्या में आम नागरिक अपनी प्रोफाइल में तिरंगा लगाकर इस अभियान को अपना समर्थन दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने अपने अधिकृत ट्विटर हैंडल और शीर्ष नेताओं ने अपनी प्रोफाइल में तिरंगा थामे नेहरू जी का चित्र लगाकर एक तरह से इस अभियान का विरोध किया है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने संभवतः यह बताते का प्रयास किया कि तिरंगे पर उनका ही उत्तराधिकार है। यह देश का राष्ट्रध्वज कम, बल्कि उनके नेताओं का ध्वज अधिक है। कई नेता तो साफ़-साफ़ लिख रहे हैं कि देश को तिरंगा झंडा उनके नेताओं की वजह से मिला। पहली बात तो यह कि स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले राजनेता सबके हैं, किसी एक विशेष पार्टी या परिवार तक उनको सीमित करके देखना, क्षुद्र दृष्टिकोण का परिचायक है। दूसरी बात यह कि तिरंगा के लिए किसी एक को श्रेय देना, बाकी उन सबका अपमान है, जिन्होंने तिरंगे के लिए अपना बलिदान दिया है। जम्मू-कश्मीर में आज शान से तिरंगा फहराता है, यह स्थिति किसके संघर्ष से बनी? जम्मू-कश्मीर में ‘एक निशान-एक विधान-एक प्रधान’ के लिए किसने बलिदान दिया? कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की हिम्मत किस राजनीतिक दल के कार्यकर्ता दिखाते आये हैं? उन कांग्रेसियों को जरा विचार करना चाहिए, जो यह पूछ रहे हैं कि भाजपा और आरएसएस का तिरंगे से क्या सम्बन्ध है? भारत के राष्ट्रध्वज से प्रत्येक नागरिक का सम्बन्ध है। गोवा मुक्ति आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजा भाऊ महाकाल और उनके साथियों ने उस समय सीने पर गोली खाई, जब वे तिरंगा थामकर आगे बढ़ रहे थे। गोवा में पुर्तगीज के झंडे उतारकर तिरंगा फहराने वालों में आरएसएस के कार्यकर्ता सबसे आगे थे। भाजपा की वरिष्ठ नेता सुश्री उमा भारती ने तो कांग्रेस के शासनकाल में कर्णाटक के हुबली में स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने के लिए कानूनी कार्यवाही का सामना किया है। अपनी ऐसी ही संकुचित मानसिकता के साथ कांग्रेस ने 2016 में आरएसएस के कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की मुहीम चलायी। दरअसल, अपने ही झूठे प्रपंच में फंसी कांग्रेस की धारणा बन गई थी कि संघ तिरंगे का विरोधी है, इसलिए वह अपने कार्यालय पर राष्ट्रध्वज नहीं फहराने देगा। रैली लेकर पहुंचे कांग्रेसी उस समय शर्मसार हो गए, जब संघ के कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार स्वागत किया और तिरंगे को फहराया। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रतिवर्ष ही राष्ट्रीय पर्वों पर ध्वज वंदन करते ही हैं। जिन कांग्रेसियों एवं उनके सलाहकार कम्युनिस्टों ने यह झूठ फैलाया था, उनकी ही सरकार ने केरल में आरएसएस के सरसंघचालक को तिरंगा फहराने से रोका था। वास्तविकता तो यह है कि पिछले वर्ष तक कम्युनिस्ट पार्टी ही राष्ट्र ध्वज नहीं फहराती थी, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का आयोजन भी उनके यहाँ नहीं होता था। तिरंगा थामे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का चित्र पोस्ट करके कांग्रेस ने ‘परिवारवाद’ के आरोपों को भी मजबूती दी है। कांग्रेस इस आरोप से बच सकती थी यदि वह किसी अन्य कांग्रेसी नेता का तिरंगे के साथ चित्र साझा करती। परन्तु विडम्बना है कि कांग्रेस की दृष्टि नेहरु-गाँधी परिवार से बाहर ही नहीं जाती है। बहरहाल, देशाभिमान जगाने वाले अभियान पर अतार्किक बहस को हवा देकर कांग्रेस ने अपना ही नुक्सान किया है, यह बात उसे जितनी जल्दी समझ आ जाये, उतना उसके लिए अच्छा होगा।

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