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कानूनी लड़ाई कानूनी ढंग से लड़ें, उस पर राजनीति क्यों?

एक जाति के उपनाम को लेकर दिए गए मानहानिकारक बयान के कारण कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को हुई दो वर्ष की सजा के बाद से यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि उनकी संसद सदस्यता चली जाएगी। यानी वे संसद में बैठने के योग्य ही नहीं रहेंगे अपितु आठ वर्ष तक चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे। आखिरकार शुक्रवार को लोकसभा सचिवालय ने राहुल गांधी की संसद सदस्यता को समाप्त किए जाने का आदेश जारी कर दिया। यह समूची प्रक्रिया कानून के दायरे में की गई है। परंतु कांग्रेस इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है। आश्चर्य की बात है कि कुछ विपक्षी दलों के नेता भी कांग्रेस के साथ खड़े दिख रहे हैं, जबकि ऐसे ही प्रकरणों में उनके नेताओं की सदस्यता भी समाप्त हुई। परंतु तब न तो इस तरह से हो-हल्ला मचाया गया और न ही कांग्रेस ने उन राजनीतिक दलों एवं नेताओं का साथ दिया, जिनकी सदस्यता रद्द हुई। अपितु राहुल गांधी ने ही उस अध्यादेश की प्रति को सार्वजनिक रूप से फाड़ा था, जिसमें सजायाफ्ता होने पर नेता का अपनी सदस्यता बचाने के लिए कुछ अवसर देने का प्रावधान कांग्रेसनीत यूपीए सरकार एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने किया था। तब राहुल गांधी ने स्पष्ट संदेश दिया था कि न्यायालय जिसे सजा सुना दे, उसे संसद का सदस्य नहीं रहना चाहिए। दो वर्ष या उससे अधिक सजा होने पर किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त करने का आदेश भी सर्वोच्च न्यायालय ने दिया था। कैसा संयोग है कि जिस बात की वकालत करते हुए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में सरकार के आदेश को सार्वजनिक रूप से फाड़ा दिया था, आज कांग्रेस उसी आग्रह का पालन नहीं कर रही है। याद रखें यह पहली बार नहीं है कि जब किसी संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य को सजा होने के बाद उसकी सदस्यता समाप्त की गई हो। लालू प्रसाद यादव से लेकर आजम खान तक कई उदाहरण हैं। जैसा की जाहिर है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर राजनीति करेगी। उसके जवाब में भाजपा ने भी अपनी तैयारी कर रखी होगी। परंतु कांग्रेस को यह अवश्य ही स्मरण रखना चाहिए कि राहुल गांधी को सजा न्यायालय ने सुनायी है, केंद्र या भाजपा शासित गुजरात की सरकार ने नहीं। और यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी अपने बयानों के कारण फंसे हैं। पूर्व में वे इसी प्रकार के मानहानिकारक बयानों के चलते सर्वोच्च न्यायालय में बिना शर्त माफी भी माँग चुके हैं। इसलिए कांग्रेस यदि राहुल गांधी की सजा को भाजपा की साजिश के तौर पर प्रचारित करके राजनीतिक दांव खेलने की सोच रही है, तब यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। वैसे भी कानूनी लड़ाई को कानून की परिधि में ही लड़ना चाहिए, उस पर राजनीति करना बेतुका है। यदि कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि सूरत के सत्र न्यायालय का निर्णय ठीक नहीं है, तब न्यायापालिका ने ही व्यवस्था दी है कि राहुल गांधी ऊपरी न्यायालय में सत्र न्यायालय के निर्णय को चुनौती दे सकते हैं। और यदि वहाँ भी उनके पक्ष में निर्णय न आए तो वे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं। लेकिन न्यायालय के निर्णय को लेकर सड़क पर रैली निकालने का ख्याल व्यर्थ ही जान पड़ता है। इससे जनता की संवेदनाएं कितनी बटोरी जा सकती हैं, कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना तय है कि सड़क की राजनीति से न्यायालय का निर्णय नहीं बदलेगा। न्यायालय के निर्णय को तो कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत ही चुनौती देनी होगी। न्यायालय का निर्णय नहीं बदला तो उनकी संसद सदस्यता भी बहान नहीं होगी। ऐसे में ट्वीटर पर महात्मा गांधी को उद्धृत करने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लक्षित करने से भी कोई लाभ नहीं है। इस मामले को लेकर कांग्रेसी नेता गैर-जिम्मेदार होकर बयानबाजी कर रहें, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। विशेषकर न्यायालय को ही कठघरे में खड़ा करने के प्रयास संविधान के एक मजबूत स्तम्भ की अवमानना है। ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी को हुई सजा के बाद भी कांग्रेस के नेताओं ने सबक नहीं लिया है। अब भी वे संभलकर बोलने की जगह ऐसे मनमाने बयान दे रहे हैं, जो किसी की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचा सकते हैं। जैसे कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का यह कहना कि “जिस तरह से न्यायाधीशों को बदला गया, उससे हमें पहले से अंदाज लग रहा था”, सीधे तौर पर न्यायालय और न्यायाधीशों के प्रति अवमानना का प्रयास है। भले ही अपने इसी वक्तव्य में मल्लिकार्जुन आगे कहते हैं कि न्यायपालिका में उनका विश्वास है और वे कानून के तहत लड़ेंगे लेकिन अपनी उक्त टिप्पणी से उन्होंने न्यायालय के प्रति अविश्वास व्यक्त कर ही दिया। कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल के मुखिया को इस प्रकार की गैर-जिम्मेदार बयानबाजी नहीं करनी चाहिए। यदि अपने पक्ष में निर्णय नहीं आया, तो उसको चुनौती दी जा सकती है लेकिन इस तरह से न्यायालय और न्यायाधीशों पर अंगुली उठाना ठीक बात नहीं है। परंतु कांग्रेस के नेता यही कर रहे हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अच्छा होगा कि इस मामले को सड़क की अपेक्षा न्यायालय में ही कानून की परिधि में रहकर लड़ा जाए।

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