शिखर सम्मेलन से आशाएं

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आज से इंडोनेशिया के बाली में जी-20 देशों का 17वां शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है। भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन विशेष एवं महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारत को दुनिया के इस प्रभावशाली संगठन की अध्यक्षता मिलनेवाली है। जी-20 समूह की अध्यक्षता एक वर्ष के लिए ही है, लेकिन महत्वपूर्ण इस मायने में है कि जब विश्व के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां सिर उठाए हुई हैं, तब भारत को यह जिम्मेदारी मिल रही है। इस वैश्विक मंच की अध्यक्षता की जिम्मेदारी भारत को एक भरोसे के साथ सौंपी जा रही है। विश्वास है कि वैश्विक पटल पर लोकप्रिय हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत उस भरोसे पर खरा उतरेगा। बहरहाल, जी-20 का यह शिखर सम्मेलन जिन परिस्थितियों में हो रहा है, उन्हें किसी भी दृष्टि से सामान्य नहीं कहा जा सकता।
जैसा कि ज्ञात ही है कि इस समय दुनिया के सामने रूस और यूक्रेन का युद्ध एक बड़ी चुनौती के रूप में है, जो महीनों से जारी है। ऐसे में रूस की मौजूदगी में शिखर बैठक का माहौल कितना सामान्य और सौहार्दपूर्ण रह पाएगा, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि शिखर बैठक से पहले ही रूस ने साफ कर दिया कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इसमें शिरकत नहीं करेंगे, न ही इस बैठक को वर्चुअली संबोधित करेंगे। उनकी जगह विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव रूस की नुमाइंदगी करेंगे। इसके बावजूद कई सदस्य राष्ट्रों के प्रमुख रूस की मौजूदगी को लेकर इस कदर असहज महसूस कर रहे थे कि सभी नेताओं का समूह चित्र लेने के पारंपरिक कार्यक्रम इस बार टाल दिया गया है। देखना होगा कि सम्मेलन के आखिर में कोई साझा वक्तव्य भी जारी हो पाता है या नहीं। मगर इन सबके बीच शिखर बैठक के दौरान विभिन्न नेताओं के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठकों को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडन और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात पर सबकी नजरें टिकी हैं। बतौर राष्ट्रपति बाइडन की यह शी से पहली ही आमने-सामने की मुलाकात है, लेकिन ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच हाल में बनी तनातनी के मद्देनजर इसका महत्व बढ़ गया है।
इस बीच उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण तनाव का एक और बिंदु बन कर उभरे हैं। माना जा रहा है कि शी चिन फिंग के साथ मुलाकात में बाइडन यह मसला भी उठाएंगे। उत्तर कोरिया इस साल 60 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च कर चुका है जो पिछले कुछ समय से हर साल किए जाने वाले औसत लॉन्च के दोगुने से भी ज्यादा है। अमेरिका का कहना है कि अगर उत्तर कोरिया का यही रवैया रहा तो उसे उस इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का फैसला करना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो उस क्षेत्र में एक अलग तरह की होड़ शुरू हो सकती है, जो किसी के लिए भी लाभदायक नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विभिन्न नेताओं से मिलेंगे, लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी के साथ उनकी मुलाकात का कोई कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। फिर भी इस महत्वपूर्ण मंच पर जब दुनिया के प्रमुख नेता जुट रहे हैं तो उम्मीद इससे दूर खड़ी नहीं रह सकती। देखना होगा कि दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने का क्या हल इस दो दिवसीय बैठक से निकलता है। भारत तो स्पष्टत: शांति, सौहार्द और सह-अस्तित्व का पक्षधर ही है और उसके प्रयास वैश्विक स्तर पर शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करने की दिशा में ही रहते हैं।

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