Home संपादकीय अशांति फैलाने के प्रयास न हों

अशांति फैलाने के प्रयास न हों

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उत्तरप्रदेश में हुए दर्दनाक हादसे के बाद जब पीडि़त परिवारों, प्रदर्शनकारियों एवं प्रशासन के बीच सहमति बन गई, तब विपक्षी राजनीतिक दल लखीमपुर का राजनीतिक पर्यटन करके क्या प्राप्त करना चाहते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे नेता एवं दल अपने वक्तव्यों से शांत हो रहे वातावरण को फिर से अशांत करना चाहते हैं। हालाँकि अब तक के घटनाक्रम में उत्तरप्रदेश सरकार ने बहुत राजनीतिक समझदारी दिखाते हुए मामले को बिगडऩे से बचा लिया है। वहीं, अपना घर जलता हुआ छोड़कर कई मुख्यमंत्री और विपक्षी नेता लखीमपुर आने की जिद कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उत्तरप्रदेश आना है, लेकिन अपने ही प्रदेश में भड़की सांप्रदायिक घटना की चिंता उन्हें नहीं है। वहाँ हिन्दुओं के साथ मारपीट की जा रही है। पीडि़त हिन्दू परिवार से मिलने की जगह भूपेश बघेल लखीमपुर आना चाहते हैं। इसी तरह कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को राजस्थान के पीडि़त किसान नहीं दिख रहे, जिन पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पुलिस लाठियां भांज रही है। राहुल गांधी राजस्थान में पिटते किसानों पर भला कुछ क्यों नहीं बोल रहे? इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के नेता भी उत्तरप्रदेश में अपने लिए राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए उतावले हैं। पश्चिम बंगाल में कितने ही दलित भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, कितनों के ही लोगों के घर जलाए जा चुके हैं और कितनी ही महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी की जा चुकी है लेकिन तृणमूल कांग्रेस के राजनेताओं एवं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके कष्ट को समझने के लिए पलभर की भी फुर्सत नहीं मिली।

जो नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखीमपुर खीरी में पीडि़त परिवारों से मिलने से विपक्षी नेताओं को रोक रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जिस राज्य में उनकी सरकारें हैं, वहाँ उनका भी इसी प्रकार का आचरण रहता है। बल्कि गैर-भाजपाई राजनीतिक दलों की सरकारें तो संवैधानिक संस्थाओं को भी प्रवेश नहीं करने देती हैं। हिंसा के बाद लखीमपुर खीरी में प्रशासन ने बाहरी प्रवेश को निषेध करके अच्छा ही किया। अन्यथा स्वार्थों की पोटली सिर पर लाद कर घूम रहे नेताओं के कारण वहाँ का वातावरण और हिंसक हो सकता था।

दरअसल, विपक्षी राजनीतिक दलों को विधानसभा चुनाव दिखाई दे रहे हैं और वे इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को अपने लिए एक अवसर की तरह देख रहे हैं। सब याद रखें कि हिंसा की आँच पर रोटी सेंककर राजनीति का पेट नहीं भरा जाता। देश में शांति और सौहार्द का वातावरण बनाना राजनीति का प्राथमिक कार्य होना चाहिए।

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