सांच को नहीं आंच

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सत्य को प्रतिष्ठित करनेवाली बहुप्रचलित कहावत है- ‘सांच को आंच नहीं’। अर्थात जो सत्य है, उसे किसी प्रकार का नुक्सान नहीं हो सकता। जो सत्य है, वह सामने है। गुजरात दंगों के मामले में भी यही हो रहा है, एक विशेष समूह येन-केन-प्रकारेण तब से लेकर अभी भी यशस्वी राजनेता नरेन्द्र मोदी को फंसाने का प्रयास कर रहा है। परन्तु आज तक एक भी झूठा आरोप सत्य के सामने टिक नहीं सका है। एक बार फिर न्यायालय ने झूठों के समूह के कुटिल प्रयासों को आईना दिखा दिया है। गुजरात दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निर्दोष बतानेवाली एसआईटी की रिपोर्ट को चुनौती दी गई थी। इस याचिका को सर्वोच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया है और एसआईटी की जांच को सही माना है। यहाँ यह समझने की बात है कि जाकिया जाफरी जैसे लोग झूठों के समूह द्वारा फैलाये गए दुष्प्रचार में इतने अंधे हो चुके हैं कि वे सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है। यह पहली बार नहीं हैं, जब जाकिया और उनके जैसे अन्य लोगों के आरोपों को खारिज किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में ही विशेष जांच दल ने लगभग 10 वर्ष इन आरोपों की जांच की और पाया कि नरेन्द्र मोदी सहित अन्य 64 लोगों पर लगाये गए आरोप निराधार थे। विशेष न्यायालय ने सभी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद एक बार फिर न्यायालय ने झूठों के समूह के कुटिल प्रयासों को आईना दिखा दिया है। गुजरात दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निर्दोष बतानेवाली एसआईटी की रिपोर्ट को चुनौती दी गई थी। में यह मामला गुजरात उच्च न्यायालय पहुंचा लेकिन 2017 में उच्च न्यायालय ने भी जाकिया जाफरी की याचिका को ख़ारिज करते हुए स्पष्ट कहा था कि दंगों की दोबारा जांच नहीं होगी और दंगों के पीछे कोई बड़ी साजिश नहीं थी। इसके बाद भी हिन्दुओं और नरेन्द्र मोदी को निशाना बनानेवाले समूह अपने बनाये झूठ को सही ठहराने का प्रयास करते रहते हैं। परन्तु झूठ को सच नहीं बनाया जा सकता और सच को बदला नहीं जा सकता। इसमें कोई दोराय नहीं कि इस दुर्भाग्यपूर्ण दंगे में दोनों ही समुदायों ने बहुत कुछ खोया है। भले ही कुछ लोग अभी भी इसके पीछे साजिश देखें लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि यदि गोधरा में निर्दोष रामभक्त बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को जिंदा नहीं जलाया गया होता तो गुजरात दंगे का दर्द किसी को नहीं झेलना पड़ता। कुछ पत्रकार, लेखक, फिल्मकार और एक्टिविस्ट बार-बार यह दोहराते रहते हैं कि यह दंगा मुसलमानों के विरुद्ध था परन्तु वे यह नहीं बताते कि इस दंगे में हिन्दुओं पर भी हमले हुए। हिन्दू नागरिकों की भी बड़ी संख्या में जानें गयीं हैं। बड़ी चालाकी से यह लोग हिन्दुओं की मौतों के आंकड़े को छिपा लेते हैं। बहरहाल, इस प्रकरण से एक और बात समझने की है कि स्वयं पर लगे तमाम झूठे आरोपों का सामना नरेन्द्र मोदी ने सहजता से किया और निर्दोष बाहर निकलकर सामने आये। कानूनी प्रक्रिया को राजनीतिक तौर-तरीकों से प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया। नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थक सत्य जानते थे इसलिए वे कभी किसी जांच से डरे नहीं। सच भला क्यों डरने लगा? हाल ही में जब प्रवर्तन निदेशायल ने कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी को स्वतंत्रतासेनानियों के परिश्रम से स्थापित समाचारपत्र को ख़त्म करने और उससे जुड़े आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले में पूछताछ के लिए बुलाया तो कांग्रेस ने जैसा प्रदर्शन किया, वैसा कुछ भी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नहीं कराया। जबकि आम समाज में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी, वे चाहते तो कैसा भी प्रदर्शन करा सकते थे। लेकिन उन्होंने संविधान और कानून पर भरोसा किया, सत्य के प्रति आस्था प्रकट की। यह सीखने और अनुकरण करने की बात है। अगर आप सत्य हैं तो फिर कोई भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर होने वाले राजनीतिक और वैचारिक हमलों में यह दिखाई भी देता है कि हर कदम पर सत्य का प्रकाश और बढ़ जाता है।

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