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कमलनाथ के चेहरे पर कांग्रेस असमंजस में या बात कुछ और है

कर्नाटक चुनाव में मिली जीत ने कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है, इसी आत्मविश्वास के बल पर बीते दिन कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में जीत का बड़ा दावा किया है। हालांकि कर्नाटक और मध्यप्रदेश की स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है। मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का संगठन कर्नाटक के मुकाबले बहुत मजबूत है और सरकार की छवि भी अपेक्षाकृत अच्छी है। इसके बाद भी राहुल गांधी दावा कर रहे हैं कि मध्यप्रदेश में उनकी पार्टी को 150 सीटें मिलेंगी। प्रत्येक राजनीतिक दल का अपना आकलन होता है। राहुल गांधी के दावे का उत्तर देते हुए भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि भाजपा को इस बार 200 से अधिक सीटों पर जीत मिलेगी। जनता का आशीर्वाद किसको और कितना मिलेगा, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा। फिलहाल राजनीतिक माहौल बनाने का दौर तो शुरू हो चुका है। कांग्रेस की जीत का दावा करते हुए राहुल गांधी मध्यप्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सामने असमंजस की स्थितियां बनाकर चले गए हैं। जब उनसे पूछा गया कि कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा कमलनाथ होंगे, तब उन्होंने इसका उत्तर नहीं दिया। जब फिर से यह पूछा गया तब उन्होंने कहा कि आप यह देखिए कि हमारी 150 सीट आ रही हैं। मध्यप्रदेश में भाजपा से लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ता और जनता के बीच में भी जब यह बात स्पष्ट थी कि कांग्रेस की ओर से कमलनाथ ही चेहरा हैं, तब राहुल गांधी ने कमलनाथ के नाम पर सहमति न देकर क्या संदेश देने का प्रयास किया है? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अब जोरों पर है। पहले भी कांग्रेस के भीतर इस बात के लिए संघर्ष था कि मुख्यमंत्री का चेहरा कौन बनेगा? कई दावेदार अपने समर्थकों के सहारे अपना नाम आगे बढ़ा रहे थे। तब मध्यप्रदेश कांग्रेस के सोशल मीडिया अकाउंट से मुख्यमंत्री के तौर पर स्पष्ट रूप से कमलनाथ को प्रस्तुत किया गया था। कमलनाथ अभी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। ऐसे में माना जा सकता है कि उस समय जब हर कोई मुख्यमंत्री का चेहरा बनने की कोशिश कर रहा था, तब सबके जोश को ठंडा करने और संदेश देने के लिए प्रदेश अध्यक्ष के संकेत पर ही सोशल मीडिया अकाउंट से कमलनाथ को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बताया गया था। संभव है कि कमलनाथ का यह तौर-तरीका आलाकमान को पसंद नहीं आया हो। इसलिए जब यह प्रश्न आया कि क्या कमलनाथ मुख्यमंत्री होंगे, तब राहुल गांधी ने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के सामने ही इस प्रश्न से किनारा कर लिया। राहुल गांधी की इस बेरुखी का कमलनाथ के मन पर क्या असर हुआ होगा, कहा नहीं जा सकता। दरअसल, मध्यप्रदेश के चुनाव को लेकर चली लंबी बैठक में जिलाध्यक्षों एवं अन्य नियुक्तियों को लेकर भी आपसी मतभेद उभरकर सामने आए हैं। राहुल गांधी ने जिस प्रकार का असमंजस का वातावरण बना दिया है, उससे कांग्रेस का लाभ होने की जगह नुकसान भी हो सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में जब कमलनाथ को सीधा संदेश था कि जीतने के बाद आपको ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, तब कमलनाथ ने विजय प्राप्त करने के लिए अपना समूचा राजनीतिक अनुभव झौंक दिया। दुविधा की इस स्थिति में क्या इस बार कमलनाथ की टीम उसी जोश के साथ काम कर पाएगी? उधर, दिग्विजय सिंह पार्टी संगठन को अपने पक्ष में मजबूत कर रहे हैं। कमलनाथ की अपेक्षा उनकी सक्रियता अधिक है, जो कहीं न कहीं अब कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। यह तो स्पष्ट दिखायी देता है कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ की अपेक्षा दिग्विजय सिंह अधिक सक्रिय हैं, पार्टी पर भी उनकी पकड़ गहरी है। ऐसे में आलाकमान का आशीर्वाद मिल गया, तब दिग्विजय सिंह भी बाजी मार सकते हैं। नये नेतृत्व की बात करें, तब इंदौर से जीतू पटवारी ऐसा नाम है, जिसे राहुल गांधी के सर्वाधिक निकट माना जाता है। पद के लिए अड़ने में भी पटवारी पीछे नहीं रहते हैं। कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद भी अब तक पटवारी स्वयं को कार्यकारी अध्यक्ष बताते हैं। उस मामले में भी कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व असमंजस की स्थिति ही बनाए हुए है। बहरहाल, कमलनाथ के नाम पर हामी नहीं भरने के पीछे कुछ और कारण भी हो सकते हैं। वे कारण क्या हैं, यह धीरे-धीरे सामने आ ही जाएगा।

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