फिर टूटी कांग्रेस

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एक ओर राहुल गांधी अपनी खोयी हुई राजनीतिक जमीन पाने के लिए ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाल रहे हैं, वहीं गोवा में एक बार फिर कांग्रेस टूट गई है। पिछले दिनों पूर्व कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद ने ठीक ही कहा था कि राहुल गांधी को भारत जोड़ो नहीं अपितु ‘कांग्रेस जोड़ो यात्रा’ निकालने की आवश्यकता है। इस घटनाक्रम के बाद भी शायद ही राहुल गांधी और उनके सिपहसलारों को समझ आए कि घृणा और नफरत की मानसिकता के साथ एक राष्ट्रीय संगठन के कार्यकर्ताओं की पुरानी गणवेश को आग लगाने की अपेक्षा अपने कार्यकर्ताओं को थोड़ा समय एवं सम्मान देकर जोड़ना कांग्रेस का उद्देश्य होना चाहिए। कांग्रेस को नफरत और अभिमान छोड़कर पार्टी की मजबूती पर ध्यान देना चाहिए। परंतु जिस तरह से कांग्रेस गोवा के इस बड़े झटके के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराकर सच्चाई से मुंह चुरा रही है, उससे तो ऐसा संकेत मिल रहा है कि अभी कांग्रेस और टूटेगी। अभिमानी नेतृत्व और अपरिपक्व सलाहकारों की मंडली के कारण भारतीय राजनीति का सुदीर्घ अनुभव रखनेवाली कांग्रेस की स्थिति उस रस्सी की तरह हो गई है, जो जल तो पूरी तरह गई है लेकिन उसका बल नहीं गया है। जब तक कांग्रेस यह बल नहीं छोड़ेगी, उसे उसकी गलतियां ध्यान नहीं आएंगी। कांग्रेस को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या कारण रहे होंगे कि जिन विधायकों को राहुल गांधी स्वयं पाँच साल तक कांग्रेस नहीं छोड़ने की शपथ दिलाकर आए थे, उनसे हलफनामे पर हस्ताक्षर कराए थे, वे ही उस समय राहुल और कांग्रेस को छोड़कर चले गए, जब एकजुटता की सबसे अधिक आवश्यकता थी। गोवा में कांग्रेस के 11 विधायक थे। इनमें से 8 विधायकों ने कांग्रेस से नाता तोड़कर भाजपा से जुड़ गए हैं। एक बात स्पष्टतौर पर समझनी चाहिए कि गोवा में भाजपा के गठबंधन को पूर्ण बहुमत है। भाजपा की कोई मजबूरी नहीं थी कि वह कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर अपने पाले में लाए। यहाँ स्पष्टतौर पर दिख रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व की अदूरदर्शी सोच और कमजोर राजनीतिक समझ के कारण उसके विधायक पार्टी छोड़कर गए हैं। जिस तरह से कांग्रेस ने गोवा में वरिष्ठ और पुराने कांग्रेसी नेताओं की अनदेखी कर भाजपा से आए माइकल लोबो को महत्व दिया, उससे पार्टी में असंतोष पनपने लगा था। इसी तरह विधानसभा चुनाव में हार के बाद चिह्नित लोगों पर कार्रवाई की गई और कुछ लोगों को छोड़ दिया गया, उससे भी नेतृत्व के प्रति असंतोष बढ़ा। सर्वस्वीकार्य अध्यक्ष नियुक्त नहीं करने के कारण भी गोवा कांग्रेस में घमासान मचा हुआ था। इस सबके अलावा गोवा में कांग्रेस के टूटने के संकेत लंबे समय से मिल रहे थे लेकिन नेतृत्व ने इस सबकी अनदेखी एवं अनसुनी की। कांग्रेस छोड़नेवाले विधायकों ने यह आरोप भी लगाया है कि प्रदेश स्तर की राजनीति को लेकर वे राहुल गांधी से बातचीत के लिए समय चाहते थे लेकिन ऐसा न हो पाने के चलते उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र देने का मन बनाया। यह किसकी नाकामी कही जाएगी? इस संवादहीनता की जिम्मेदारी कौन लेगा? जाहिर है कि इस सबके लिए राहुल गांधी स्वयं तो जवाबदेही लेने से रहे, अन्य भी उनकी ओर अंगुली नहीं उठा सकते और यदि किसी ने साहस दिखाकर सच्चाई कह दी तो परिवार विशेष के प्रति अनन्य श्रद्धा रखनेवाली मंडली उस पर हमलावर हो जाएगी। इसलिए सब चुप हैं। इस चुप्पी की भी भारी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ रही है।

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