Home बोध कथा क्या करूं, क्या न करूं

क्या करूं, क्या न करूं

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एक व्यक्ति ने एक कुत्ता और बिल्ली पाल रखे थे। बिल्ली बहुत बोलती थी और रात को म्याऊं-म्यांऊ करती थी। मालिक को यह अखरता क्योंकि वह उसे सोने नहीं देती थी। आखिर एक दिन गुस्से में मालिक ने उसे पीट दिया। वह जोर-जोर से कह रहा था-यह दिन रात म्याऊं-म्याऊं करती है और मुझे सोने नहीं देती। कुत्ता यह सब देख रहा था। उसने भी मौन रहने में ही भलाई समझी। ऐसे ही दिन गुजर रहे थे कि एक दिन घर में चोर घुस गए। मालिक ने कुत्ते की खूब खबर ली। वह अविवेकी यह नहीं समझ पाया कि बिल्ली की बोलने पर मरम्मत हुई तो मुझे क्यों दंड दिया गया। मालिक ने कहा कि तुझे पाला क्यों है। भौंकने के लिए। रात को तेरे न भौंकने से चोर घर में घुस गए। कुत्ते के सामने सवाल खड़ा था कि मौन अच्छा या बोलना। मैं क्या करूं। यह किंकर्तव्यविमूढ़ता या दिशाहीनता उस व्यक्ति के सामने आती है जो काल, समय व परिस्थिति के अनुरूप नहीं सोचता। जो व्यक्ति विवेक का प्रयोग नहीं करके एक ही व्यवहार को हर जगह और प्रत्येक परिस्थिति में लागू करता है, उसे दुर्दिन देखने पड़ते हैं।

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धारा के अनुकूल
एक बार पहाड़ी नदी पार करने की कोशिश में एक बूढ़े सन्यासी का पांव फिसल गया। वह नदी की तेज धारा में बहने लगे। उनके शिष्य बदहवास से उनके पीछे भागने लगे। कुछ दूर जाकर नदी एक झरने में तब्दील होकर गहरी घाटी में गिरने लगी। शिष्यों को लगा कि अब घाटी से गुरु का शव ही बरामद होगा लेकिन जब वे नीचे पहुंचे तो धीमी पड़ी जलधार में से निकलकर संत मुस्कुराते हुए चले आ रहे थे। उन्हें देखकर घबराया हुआ शिष्य बोला- यह तो चमत्कार है। आपको कुछ नहीं होगा। आपने खुद को सकुशल कैसे बचाया? संत ने कहा- खुद को बचाने के लिए क्या करना था। मैं तेज धार को अपने अनुकूल नहीं कर सकता था इसलिए खुद को ही उसके अनुकूल बना लिया। इसके बहाव में खुद को छोड़ दिया। उसके साथ बहता, उछलता, घूमता गिरता पानी के साथ गया और पानी के ही साथ वापस भी आ गया।

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