Home बोध कथा टिटहरी का आत्मबल

टिटहरी का आत्मबल

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टिटहरी के अंडे-बच्चे समुद्र बहा ले गया। टिटहरी ने विचार किया कि समुद्र आज मेरे-अंडे बच्चे बहा ले गया तो कल मेरे और सजातीयों के बच्चों को भी बहा ले जाएगा। इससे उत्तम है कि समुद्र का विनाश कर दिया जाए। बड़ा विचार था। पर ऐसा सोचकर उसने सारे बंधु-बांधवों, मित्रों-परिचितों को एकत्र किया और सबने मिलकर समुद्र का जल अपनी चोंचों से भरकर बाहर फेंकना आरंभ किया। विपत्ति काल में उन्होंने अपने उत्साह को भंग नहीं किया। एक ऋषि वहां से गुजर रहे थे।

पक्षियों को चोचों से समुद्र का पानी खाली करते देखकर उन्होंने कहा कि यह क्या मूर्खता का काम कर रहे हो? क्या तुम समुद्र को खाली कर सकते हो? क्या अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है? इस मूर्खता के काम को छोड़ो। इस पर उस टिटहरी ने उत्तर दिया-महाराज आप देवर्षि होकर मुझको ऐसा उपदेश करते हैं। आप हमारे शरीरों को देख रहे हैं, हमारे आत्मबल को नहीं देखते।

इस उत्तर को सुनकर ऋषि महाराज चौंके ही नहीं, प्रभावित हुए और समुद्र से क्रोध करके बोले- अरे इसके अंडे बच्चे क्यों बहा ले गया? इस पर समुद्र ने झट अंडे बच्चे फेंक दिए और कहा मैं तो मखोल करता था। आत्मा अर्थात भीतर वाली शक्ति पर विश्वास रखो। टिटहरी के मन में यही विश्वास आया जिससे उसने साहस के साथ कमर बांधे रखी।

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