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राजसत्ता और साहित्य

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असाधारण-प्रतिभा के कवि थे गुणाढ्य। उनकी अमर कृति का नाम है-बड्डकहा या बृहत्कथा! भारत के लोकजीवन का महाकाव्य। आचार्य सोमदेव ने कथासरित्सागर के रूप में उसका संपादन किया था ! लोकजीवन मानो स्वयं ही बोल रहा है। यदि गुणाढ्य राजा से सच न कहता और सच कहने के अपराध में राजा उसे निर्वासन का दंड न देता, तो हम इस महान कृति से वंचित रह जाते। सत्ता को वही सच सुहाता है,जो उसके प्रतिकूल न हो! पर सच तो सच। गुणाढ्य सच्चा कवि था।

सच कह दिया और दंड भी मिला -निर्वासन। राज्य से बाहर पिशाचों की बस्ती थी। वहां जा कर रहने लगा। पिशाचों के कबीले में आकर उसने पैशाची- प्राकृत सीखी और पिशाच-लोकजीवन की कहानियों का संकलन करने लगा। एक दिन जब उसका कथासत्र प्रारंभ हुआ तो लोग एकत्र होकर कहानियां सुनते, राजा के यहां रसोई का सामान समय पर नहीं पंहुच पाता। उसको जब मालूम पडा कि यह तो वही गुणाढ्य है,तब वह राजा स्वयं ही कथा सुनने आ पंहुचा। राजा ने गुणाढ्य को प्रणाम किया। साहित्य की शक्ति ने सत्ता को मजबूर कर दिया ।

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