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संशयात्मा विनश्यति

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एक मनुष्य ने अपने खेत में कुआं बनाने के लिए दो हाथ गड्ढा खोदा। इतने में किसी ने आकर उससे कहा-तुम बेकार मेहनत करते हो। यहां तो रेत ही निकलेगी, पानी नहीं। उस आदमी ने वहां खोदना बंद कर दूसरे स्थान में खोदना शुरू किया। इतने में एक तीसरे आदमी ने आकर टोका-क्यों व्यर्थ परिश्रम करते हो। यहां तो खारा पानी निकलेगा।

पहले आदमी ने वहां भी खोदना बंद कर दिया और कुछ दूर जाकर खोदने लगा तब एक चौथे आदमी ने आकर वहां भी टोका- यहां पहले एक कुआं था। बिल्कुल पानी नहीं था। सूखे कुएं में भूत रहता था। वह जिस किसी को देखता, उसे खा जाता। तुम वहां खोदोगे तो जलरहित सूखा कुआं भी निकलेगा और उसमें भूत का निवास होगा।इस प्रकार उस मनुष्य ने कुआं खोदने के लिए मेहनत तो की परंतु अविश्वास के कारण फलीभूत नहीं हुआ।

कहने का तात्पर्य है कि भक्ति रूपी जल प्राप्त करने के लिए प्रयास करने पर भी कोई कहे कि यह शास्त्र झूठा है, यह गुरु ढोंगी है या तुम स्वयं आडंबरी हो तो संशय मन में घर कर लेता है और सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता। इसलिए अपना दृढ़ विश्वास रखो। संशय को स्थान न दो क्योंकि संशयात्मा विनश्यति।

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