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चूहों का संरक्षक बिलाव

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कमजोर के तो हजार दुश्मन होते ही हैं, सो चूहों के भी दुश्मन थे। एक समय की बात कि चूहों ने पंचायत की कि अपने लिये एक संरक्षक बना लेना जरूरी है । पास में चूल्हे के पास एक बूढ़ा बिलाव सो रहा था। उसे देखकर चूहे बोले कि इस बूढ़े बिलाव को ही अपना संरक्षक बना लें ! इसका व्यवहार भी ठीक है, यह कुत्ते की तरह भोंकता भी नहीं और झपटता भी नहीं।

चूहे जुलूस बनाकर बूढ़े बिलाव के पास गये। बोले, आप हमारे संरक्षक बन जाइये। बूढ़ा बिलाव बोला लेकिन मेरी एक शर्त है कि मुझे आप लोगों की रक्षा के काम से कचहरी तो जाना ही पड़ेगा, मैं हूं बूढ़ा, कमजोर भी, अकेला नहीं जा सकता, सो मेरे सहारे के लिये बारी-बारी से एक चूहा चला करेगा। मंजूर है ! चूहों ने कहा। समझौता हो गया। अब चूहे भी खुश थे और बूढ़ा बिलाव भी। बूढ़ा बिलाव मोटा होता जा रहा था।

एक चूहे को शक हुआ कि यह मोटा हो रहा है और चूहों की संख्या घट रही है,बात क्या है? उस चूहे ने दूसरे चूहों को बुलाया, कहा कि वैसे तो आज मेरी बारी है, बूढ़े बिलाव के साथ आज मैं ही जाऊंगा किन्तु तुम सब लोग मेरे पीछे-पीछे चुपके से आकर बूढ़े बिलाव को देखना कि यह क्या करता है ? वह चूहा बूढ़े बिलाव के साथ कुछ दूर ही चला था कि वह बिलाव बोला, मुझे भूख लगी है, खाने को दो।

चूहे ने कहा कि यहां खाने को क्या है ? बूढा बिलाव उस पर झपट पड़ा कि तू है तो सही। वह उसे खा गया। बिलाव की करतूत को सबने देख लिया था। वे समझ गये कि बूढ़े बिलाव को अपना संरक्षक बनाकर चूहों को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी ! चूहे अपने बिलों में घुस गये !

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