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राजा भोज की युक्ति

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प्राचीन काल में एक धारा नगरी थी। यह मालवा की राजधानी थी। इसी राजवंश में सिंधुराज नाम का एक राजा हुआ, जिसे ‘सिंधुल’भी कहा जाता था। भोज इन्हीं का पुत्र था। अचानक सिंधुल बीमार पड़ा। भोज अभी छोटा था उसे गद्दी नहीं दी जा सकती थी। और यदि गद्दी दे भी दी गई तो वह उसे संभाल नहीं सकेगा, ऐसी आशंका थी। सिंदूर की चिंता बढ़ी। उसने अपने भाई भुंजराज को ही राजा बनाने का निश्चय किया और उसे भोज की सुरक्षा का भार सौंपा। भोज बचपन से ही गुणी था। प्रजा उसे बहुत प्यार करती थी। कुछ समय बाद सिंधुल की मृत्यु हो गई।

भुंजराज के मन में पाप जागा। भुंजराज ने कुछ दिनों तक बड़ी योग्यता से शासन संभाला। प्रजा भी उसे चाहने लगी किंतु एक दिन भुंजराज के मन में पाप जागा। उसने सोचा राज्य तो भोज का ही है। प्रजा उसे चाहती भी है। बड़ा होने पर वह मुझे गद्दी से हटा देगा। क्यों न उसकी हत्या करा दी जाए? उसने अपने मंत्री को बुलाया और भोज की हत्या का काम उसे दिया। मंत्री ने पहले तो भुंजराज को बहुत समझाया कि ऐसा करना उचित नहीं है पर राजा ने एक नहीं सुनी। अंत में मंत्री ने एक युक्ति निकाली। वह हत्या के लिए भोज को जंगल ले गया। सुनसान जंगल में पहुंचकर मंत्री ने भोज को वहां लाने का कारण बताया। बालक जरा भी विचलित नहीं हुआ। उसने अपनी उंगली चीरकर भुंजराज को एक पत्र लिखा।

पत्र में संस्कृत का श्लोक था, जिसका मतलब था ‘ सतयुग में महा प्रतापी राजा मांधाता चले गए। सागर पर पुल बनवाने वाले रामचंद्र भी नहीं रहे। युधिष्ठिर आदि बड़े-बड़े प्रतापी राजा स्वर्गवासी हुए। पर पृथ्वी किसी के साथ नहीं गई। जान पड़ता है अब आपके साथ यह जाएगी। नहीं तो महज राज्य के लिए ऐसा पाप कर्म क्यों करते। मंत्री तो पहले से ही भोज के पक्ष में थे। पत्र पढ़ते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने भोज को छुपा दिया। मंत्री ने एक जानवर की हत्या कर उसके खून से सनी तलवार लेकर राजा भोज को विश्वास दिलाया कि भोज की हत्या कर दी गई है।

पहले तो राजा खुश हुआ पर जब रक्त से लिखा भोज का पत्र उसे दिया गया, तब उसे पढ़ते ही वह व्याकुल होने लगा-‘यह पृथ्वी तुम्हारे साथ जाएगी- बार-बार यह वाक्य हथौड़े की तरह उसके मस्तिष्क पर चोट करने लगा। उसकी राज्य लिप्सा काफूर हो गई।अब वह भोज के लिए व्यग्र हो रहा था। बार-बार मंत्री से भोज के बारे में पूछने लगा। कहते हैं बाद में मंत्री ने किसी युक्ति से भोज को पुन: उपस्थित कर दिया। यह कथा उस लिप्सा की व्यर्थता सिद्ध करती है जिसके पीछे हम भागते चले जा रहे हैं।

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