Home बोध कथा सहायक का अदभुद चयन

सहायक का अदभुद चयन

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अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के राज्य कार्य का जब विस्तार हुआ तो उन्हें एक सहायक की अपेक्षा हुई। सहायक का चयन करने के लिए उन्होंने अर्हता रखने वालों को आमंत्रित किया। राष्ट्रपति आसीन थे और आमंत्रित व्यक्ति एक-एक कर आ रहे थे। रास्ते में एक पुस्तक पड़ी थी। जिस पर उनकी नजर नहीं थी। किसी का पांव पुस्तक पर पड़ रहा था तो किसी के पांव से उड़ती धूल पुस्तक पर गिर रही थी और किसी के पादप्रहार से पुस्तक के पन्ने फट रहे थे। राष्ट्रपति उन सबकी गति पर नजर टिकाए बैठे थे। सभी प्रत्याशी उनका अभिवादन कर आगे बढ़ गए। राष्ट्रपति ने किसी के साथ कोई बात नहीं की।

आमंत्रित व्यक्तियों में एक ऐसा व्यक्ति था जो अवस्था में छोटा और अनुभव में कमतर लगता था। उसने मार्ग में गिरी हुई पुस्तक देखी तो एक क्षण रुका। पुस्तक उठाई, उसकी मिट्टी झाड़ी और सहेजकर किनारे रखी हुई स्टूल पर रख दिया। राष्ट्रपति का अभिवादन कर वह आगे बढऩे लगा, तभी राष्ट्रपति बोले- ‘मैंने अपने सहायक का चयन कर लिया है। ‘ किसका चयन, कैसे चयन, कब हुआ चयन? एक साथ कई फुसफुसाहटें वायुमंडल में थिरक उठीं। अब्राहम लिंकन ने गंभीर मुद्रा में कहा- एक ऐसे व्यक्ति को, जिससे मैं पूरा परिचित नहीं हूं, अपना सहायक घोषित करता हूं। उसके पास उपाधियां नहीं हैं, प्रमाण पत्र नहीं है और वह कोई बड़ा आदमी भी नहीं है, फिर भी मेरी कसौटी पर खरा उतरा है।

एक व्यक्ति जो देखने में बहुत रौबदार दिखाई दे रहा था, कुछ आगे बढ़कर बोला- आपने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी। आपको ऐसे छोकरे की जरूरत थी तो इतने बड़े लोगों को बुलाया क्यों? क्या हमारी उपाधियों और पदवियों का कोई मूल्य नहीं है? राष्ट्रपति ने कहा- महोदय मुझे आपके प्रमाण पत्रों की जरूरत नहीं है। आपकी योग्यता का सबसे बड़ा और सीधा प्रमाण पत्र है- आपका व्यवहार। आपने एक पुस्तक को पैरों तले रौंद डाला। क्या यही है आपकी दक्षता ! जो अधिकारी एक पुस्तक को संभालकर नहीं रख सकता, वह मेरे कागजात कैसे संभाल पाएगा।

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