Home बोध कथा जो त्यागपूर्वक भोगता है..

जो त्यागपूर्वक भोगता है..

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गुरुदक्षिणा की याचना करने के उद्देश्य से वरतंतु के शिष्य कौत्स जब महाराज रघु के दरबार में पंहुचे तो उन्होंने देखा कि राजा तो पहले ही खजाने को जनता की सेवा में खर्च कर चुके थे, दान कर चुके थे। राजा स्वयं मिट्टी के बर्तनों से काम चला रहे थे। अब इनसे क्या याचना करें ? महाराज रघु ने कहा कि आप कहिये, मुझे क्या सेवा करनी है ! कौत्स ने संकोच से कहा कि नहीं,अब मैं आपकी रहनी को देख चुका हूं,अब कुछ नहीं कहना।

जब महाराज ने दोबारा आग्रह किया तो कौत्स ने गुरुदक्षिणा की बात बतला दी। महाराज ने कहा कि अब कुबेर पर आक्रमण करना होगा। जब कुबेर को यह बात पता चली तो उन्होंने रात में ही राजा का खजाना भर दिया। सबेरे रघु ने कौत्स से कहा कि यह खजाना ले जाइये,यह आपके निमित्त से ही तो आया है। कौत्स ने गिनकर उतनी ही मुद्राएं निकाल लीं,जितनी गुरुदक्षिणा में देनी थी।

महाराज ने कहा कि यह मेरे किस काम का ? यह आपके निमित्त से ही आया है,आप ही स्वीकार करियेगा। नहीं ,मैं गुरुदक्षिणा से रंचमात्र अधिक नहीं लूंगा,राजन्? कौत्स ने दृढ़ता से कहा। दोनों की असंगता देखकर मानो काल ठहर गया ! तभी रघु की यज्ञशाला में महालक्ष्मी ने प्रकट होकर कहा कि राजन्? ,जो त्याग-पूर्वक भोगता है, मैं उसका खजाना कभी खाली नहीं होने देती लेकिन ऐसी रिक्त स्थिति में भी जो लोकजीवन के संचालन हेतु साधन जुटाने का पराक्रम करता है,ऐसे विष्णु-प्रतीक को छोड़कर मैं कहीं जा भी तो नहीं सकती।

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