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वृद्धा की सूझबूझ

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एक गांव में एक नेत्रहीन औरत रहती थी। वह काफी धनवान थी और उसने घोषणा की थी कि जो भी चिकित्सक उसकी आंखों की रोशनी वापस दिलाएगा उसे वह थैला भरकर सोने की मोहरें देगी। एक चिकित्सक ने उसका उपचार करने का दावा किया। पर उसके मन में नेत्रहीन महिला की दौलत देखकर लालच आ गया। उसने उपचार के बहाने नेत्रहीन औरत के घर में रखी वस्तुएं उठाकर ले जाने की योजना बनाई। चिकित्सक कई महीनों तक नेत्रहीन औरत का उपचार करता रहा? जब भी वह उसके घर आता, कोई न कोई वस्तु लेकर चला जाता।

इस प्रकार धीरे-धीरे उसका सारा सामान चिकित्सक के घर में पहुंच गया। कुछ समय बाद नेत्रहीन औरत की आंखों में रोशनी लौट आई तो चिकित्सक ने उससे अपनी शुल्क के रूप में मोहरों का थैला। मांगा वृद्धा ने इंकार कर दिया तो चिकित्सक न्यायालय में पहुंचा। उसने न्यायाधीश से कहा कि मैंने इस स्त्री का इलाज किया है और उसकी रोशनी लौटा दी है, पर बदले में वह मुझे शुल्क नहीं दे रही है।

नेत्रहीन औरत ने जब न्यायालय में कहा कि उसे दिखाई नहीं दे रहा है, तो चिकित्सक हैरान रह गया। वृद्धा ने कहा- जज साहब, मुझे अपने घर में रखा सामान दिखाई नहीं दे रहा है, तो मैं कैसे मान लूं कि मेरी आंखें ठीक हो गईं हैं। सुनकर चिकित्सक लज्जित होकर वहां से चला गया। महिला के सूझबूझ के आगे उसे झुकना पड़ा।

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