Home बोध कथा भाव से बड़ा कुछ नहीं

भाव से बड़ा कुछ नहीं

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एक करोड़पति बहुत मुसीबत में था। करोड़ों का घाटा लगा और जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी। नौका डगमगा रही थी। कभी मंदिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। पूजा के लिए पुजारी रख छोड़े थे, कई मंदिर भी बनवाये, जहां वे उसके नाम से नियमित पूजा किया करते थे, लेकिन आज इस दु:ख की घड़ी में वह भी मंदिर गया। सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली प्रार्थना वही कर सके। लेकिन यह देखकर हैरान हुआ कि गांव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया कि भिखारी क्या मांग रहा है। धनी आदमी सोचता है कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं ? और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं।

धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी? उसने सुना कि भिखारी कह रहा है , ‘हे परमात्मा! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जायेगा। आत्महत्या कर लूंगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बहुत आवश्यक हैं। मेरा जीवन संकट में है ढ्ढ’ अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है; कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है, तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिये और कहा ,’जा ये ले जा पांच रुपए, और यहां से जल्दी जा।’ अब वह परमात्मा से प्रार्थना करता हुआ बोला, ‘प्रभु !

अब मेरी मदद करें, मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है।’ भगवान मुस्करा उठे बोले , ‘एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बड़ा भिखारी ढूढऩा पड़ेगा। तुम सब लोग यहां कुछ न कुछ मांगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है? धनी आश्चर्यचकित हुआ और बोला , ‘प्रभु !आपको क्या चाहिए?’ भगवान बोले- प्रेम ,मैं भाव का भूखा हूँ । मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है । कभी इस भाव से मुझ तक आओ; फिर तुम्हें कुछ मांगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी

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