Home बोध कथा धन तो मिट्टी ही है

धन तो मिट्टी ही है

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महाराष्ट्र में रांका और बांका नाम के पति-पत्नी रहते थे। रांका बड़ा त्यागी था। उसने सब कुछ छोड़ दिया था। वह भीख भी नहीं मांगता था। प्रतिदिन जंगल से लकड़ी काट लाता और बेचकर भोजन जुटाता। शाम को कुछ बच जाता तो उसे बांट देता। सुबह फिर लकड़ी काटने चल देता। एक दिन वह बीमार पड़ गया तो तीन दिन तक लकड़ी काटने न जा सका जिससे घर में चूल्हा न जला।

चौथे दिन कमजोर था लेकिन जाना पड़ा। पत्नी भी साथ गई सहारा देने को। लकडिय़ां काटीं, रांका अपने सिर पर ग_र लिए चलने लगा। पीछे-पीछे उसकी पत्नी थी। राह किनारे अभी अभी कोई घुड़सवार निकला था जिससे धूल उड़ रही थी। तभी उसने देखा कि राह के किनारे अशर्फियों से भरी थैली पड़ी है। शायद घुड़सवार की गिर गई होगी। रांका ने सोचा, मैं तो त्यागी हूं। मैंने तो विजय पा ली। मेरे लिए तो धन मिट्टी है। मगर पत्नी के मन में लोभ न आ जाए।

कहीं यह सोचने न लगे कि रख लो। कभी दुर्दिन में काम आएंगी। अभी तीन दिन भूखे रहना पड़ा, एक पैसा न था। ऐसा सोचकर उसने जल्दी से अशर्फियों की थैली पास के गड्ढे में सरकाकर उस पर मिट्टी डाल दी। वह ऐसा करके निपटा ही था कि पत्नी आ गई। उसने पूछा, क्या करते हो। रांका ने कसम खाई थी कि झूठ नहीं बोलेगा। बड़ी मुश्किल में पड़ गया। कहे तो पत्नी झंझट न करने लगे और कहे कि रख लो, हर्ज क्या है। भाग्य ने दी है, भगवान ने दी है।

मगर झूठ न बोल सका। क्योंकि कसम खा ली थी। तो उसने मजबूरी में कहा कि सुन, मुझे क्षमा कर और कोई बात मत उठाना। सत्य कहे देता हूं। यहां थैली पड़ी थी, यह सोचकर कि तेरा लोभ न जग जाए इसलिए अशरफियों को मिट्टी से ढंक दिया। रांका की बात सुनकर बांका हंसने लगी। कहने लगी, यह भी खूब रही। मिट्टी पर मिट्टी डालते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। जरूर तुम्हारे भीतर कहीं लोभ बाकी है। जो तुम मुझ पर आरोपित करते हो, वह कहीं तुम्हारे भीतर दबा पड़ा है। तुम्हें अभी भी सोना सोना दिखाई देता है। मैं सोचती थी कि तुम त्यागी हो गए। पर यह क्या हुआ। अभी तक धोखा ही चला। तुम मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो।

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