Home बोध कथा अनीति से अर्जित धन

अनीति से अर्जित धन

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हाभारत के दिनों रात्रि के समय आक्रमण नहीं होते थे और विरोधी दल के लोग भी आपस में मिल-जुल लेते थे। एक रात्रि को दुर्योधन युधिष्ठिर के पास अपनी कुछ गुत्थियों का हल पूछने गया। वह जानता था, उनसे सही सलाह ही मिल सकती है।
दुर्योधन ने पूछा, ‘हमारे दल में भीष्म पितामह जैसे मूर्धन्य सेनापति हैं। फिर भी हम हारते जाते हैं और पाण्डव जीतते हैं। लगता है हमारे सेनापति सच्चे मन से नहीं लड़ते।’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं। नीति और अनीति का विचार हर किसी का उत्साह बढ़ाता तथा घटाता है।’ आपके दल के सैनिक यह अनुभव करते हैं कि वे अनीति के पक्ष में लड़ रहे हैं। इसलिए सहज ही उनका पराक्रम शिथिल पड़ जाता है। जबकि पाण्डव दल के लोग न्याय समर्थन की बात ध्यान में रहने से सच्चे मन से लड़ते हैं।

दुर्योधन निरुत्तर हो गया। उसने पलटकर फिर पूछा, ‘ क्या कोई ऐसी तरकीब है कि हमारे सेनापति आत्मा की आवाज न सुनें और पूरे जोश से लडऩे लगें। युधिष्ठिर ने इसका समाधान भी बता दिया। इन लोगों को नियत वेतन के अतिरिक्त ऐसा भोजन कराया जाय तो अनीति से कमाया और मुफ्त में खिलाया गया हो। दुर्योधन को यह बात जंच गई। उसने अधिक पाप से अर्जित धन निकाला और उसके व्यंजन बना-बनाकर खिलाना आरम्भ कर दिया। अब वे लोग अधिक उत्साह के साथ लडऩे लगे। अन्न के साथ मन का बहुत प्रगाढ़ सम्बन्ध है। अनीति का धन आत्मा की पुकार को शिथिल कर देती है।

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