Home बोध कथा हजरत मूसा और गड़रिया

हजरत मूसा और गड़रिया

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यदि तू मेरे पास आवेगा तो मैं तेरी दाढ़ी में कंघी करूंगा। तेरे बालों से जुएं निकालूंगा, तेरे शरीर पर तेल मालिश करूंगा, तू सोना चाहेगा तो तेरे लिये बिछौना बिछाऊंगा, अपनी दाढ़ी से तेरे पैर पोछूंगा, तू बीमार पड़ेगा तो तेरी चाकरी में दिन रात खड़ा रहूंगा। ऐ मेरे अच्छे मालिक, तू मेरे पास आ। मैं तेरा गुलाम बनकर रहूंगा। पर्वत की चोटी पर बैठा एक गड़रिया प्रभु से प्रार्थना कर रहा था। तभी हजरत मूसा उधर से निकले ,गड़रिये से बोले – रे मूर्ख क्या बक रहा है? खुदा के कहीं बाल होते हैं?

वह सर्वशक्तिमान कभी बीमार पड़ता है? और तेरे जैसे बेवकूफ चाकर की उसे जरूरत ही क्या है? बेचारे गड़रिये ने हजरत से माफी मांगी। परन्तु जब हजरत स्वयं प्रार्थना करने लगे तो दिशा ने उत्तर दिया- मूसा, तुम्हें पता होना चाहिए कि सच्चा भाव ही सच्ची उपासना है। उस गड़रिये का भाव सच्चा था। तुमने उसे मना करके आज अपराध किया है। असल में गड़रिया लोक (जनमानस) है। मूसा शास्त्र (मुनिमानस) हैं।

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