Home बोध कथा पछताएं नहीं, रास्ता निकालें

पछताएं नहीं, रास्ता निकालें

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एक दंत कथा है। एक बार एक राजा वन में शिकार के लिए गया, लेकिन अंधेरा हो जाने की वजह से वह रास्ता भटक गया। उसे एक किसान की झोपड़ी दिखाई दी। राजा किसान की अनुमति लेकर वहीं ठहर गया। किसान ने राजा की खूब खातिरदारी की। जाने से पहले राजा ने खुश होकर किसान को चंदन का वन उपहार में दे दिया। किसान को चंदन के मूल्य का तनिक भी अंदाजा नहीं था। वह चंदन की लकडिय़ों का कोयला बेचने लगा। एक दिन बारिश के कारण लकडिय़ां भींग गईं और वह कोयला नहीं बना सका।

वह कुछ टहनियों को काटकर बाजार ले गया। चंदन की खुशबू हवा में तैरने लगी। ग्राहक किसान को मुंह मांगी कीमत देने को तैयार थे। किसान पसोपेश में था कि ऐसा क्यों हो रहा है। एक ग्राहक से पूछने पर उसने चंदन की कीमत बतायी, तो किसान की आंखों में आंसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि कैसे उसने जानकारी के अभाव में चंदन की लकडिय़ों को बर्बाद कर दिया। तभी एक संत वहां से गुजरे। उन्होंने किसान से कहा कि पछताओ मत। दुनिया में हर व्यक्ति कोई न कोई गलती करता है। इसी प्रकार हर क्षण कीमती होता है, इसलिए उसे कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए। किसान को अपनी गलती का आभास हो गया। वह जंगल वापस गया और उसने चंदन के ढेरों पौधे वहां लगा दिए।

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