Home बोध कथा पागल कौन

पागल कौन

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एक धर्मगुरु एक पागलखाने में बोलने गया। उसने बड़े विस्तार से समझाया, सोचकर कि सब पागल हैं इसलिए छोटी-छोटी बात समझाई। एक पागल टकटकी लगाए देख रहा था और इतनी आतुरता से सुन रहा था कि धर्मगुरु भी प्रभावित हो गया। ऐसा तो कभी किसी ने नहीं सुना। सांस जैसे उसकी बंद है, इतना तल्लीन है। धर्मगुरु ने देखा कि वह पागल सुपरिंटेंडेंट के पास गया और उसके कान में कुछ कहा। उसे लगा कि जरूर उसने मेरे प्रवचन के संबंध में कुछ कहा होगा।

धर्मगुरु ने मौका मिलते ही सुपरिंटेंडेंट से पूछा- क्या मेरे व्याख्यान के संबंध में कुछ कहा? सुपरिंटेंडेंट ने थोड़ा झिझकते हुए कहा- हां, कहा तो आपके व्याख्यान के संबंध में ही है। धर्मगुरु बेचैन हो उठा। उसने कहा- बताएं,क्या कहा उसने? बताना जैसे नहीं चाहता था सुपरिंटेंडेंट लेकिन इतना आग्रह किया तो उसने कहा-वह आया मेरे पास और कान में कहने लगा- ‘देखो संसार का खेल, यह आदमी बाहर और हम भीतर। अन्याय हो रहा है।’ जो बाहर है और जो भीतर है उसमें बहुत फर्क है। आदमी को पहचानना कठिन है। कई लोग खुद को नहीं पहचानते। जो पहचानते हैं तो दुनिया नहीं मानती।

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