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स्वतंत्रता की चेतना

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वह साधु विद्रोही था। राजा के अत्याचार का विरोध करता था। जनता में ज्वाला सी सुलगने लगी थी। राजा ने हुक्म दिया कि साधु को मृत्युदंड मिलना चाहिये। उसे हाथ-पैर बांध कर राजा के सामने पेश किया गया। राजा ने साधु से कहा- अब तू बन्दी है। तेरा जीवन मेरी इच्छा पर निर्भर है! तूने बार-बार मेरी निन्दा की और करता ही रहा?

बोल, अब तू मेरा क्या कर सकता है? साधु ने कहा -राजा,तेरा आचरण भ्रष्ट है, तू पतित है, व्यभिचारी है और तेरे जीवन को मैं आज भी धिक्कार सकता हूं, इस जीवन पर थूक सकता हूं और साधु ने थूक दिया। स्वतंत्रता की चेतना मन में होती है, बाहर की स्थितियों में नहीं।

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