Home बोध कथा झुकने से मिलती है ऊंचाई

झुकने से मिलती है ऊंचाई

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पंडित विद्यानिवास मिश्र बहुत समय तक महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साथ रहे थे। एक दिन वे कुशीनगर गये । वहाँ भगवान बुद्ध की प्रतिमा है, जिसमें वे महानिर्वाण की मुद्रा में लेटे हुए हैं। राहुल सांकृत्यायन ने प्रतिमा के चरणों में माथा नवाया। मिश्रजी ने भी नवाया। लेकिन मिश्रजी माथा नवाने के बाद थोड़े मुसका दिये। राहुल बाबा ने उनके मुसकाने को देखा भी और समझ भी लिया,आखिर बाबा कम्युनिस्ट थे।

राहुलबाबा बाहर आकर बोले-पंडित ! तुमने सोचा होगा कि मैंने बौद्ध चीवर छोड़ दिया है, बुद्ध का मेरे लिये क्या महत्त्व ? देखो पंडित ! सच यह है कि मनुष्य कहीं न कहीं झुकना चाहता है, वह भले ही किसी ग्रन्थ के आगे झुके ,किसी ढूह के आगे झुके, कहीं भी झुके! झुकने में उसकी हेठी नहीं होती। झुकने के कारण ही उसके मन में ऊंचे उठने का एक नया संकल्प उभर आता है ।

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