Home बोध कथा राजा व संत का अहंकार

राजा व संत का अहंकार

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एक सम्राट जब छोटा बच्चा था तो उसकी एक युवक से बड़ी मैत्री थी। फिर जीवन के रास्ते अलग अलग हुए। सम्राट का बेटा सम्राट हो गया और उसका मित्र फकीर बन गया। उसकी दूर दिगंत तक प्रशंसा फैल गई, यात्री दूर-दूर से उसके चरणों में आने लगे। खोजी उसका सत्संग करने लगे। जैसे-जैसे खोजियों की भीड़ बढ़ती गई, उसका त्याग भी बढ़ता गया। अंतत: उसने वस्त्र भी छोड़ दिए, दिगंबर हो गया। लेकिन सम्राट कि मन में यही सवाल उठता था-स्कूल के दिनों में वह बड़ा अहंकारी था, अचानक इतना बड़ा त्यागी कैसे हो गया?

सम्राट को भरोसा न होता था। उसकी जिज्ञासा बढ़ती गई। अंतत: उसने अपने मित्र को निमंत्रण भेजा कि राजधानी में आओ, मुझे भी सेवा का अवसर दो, मेरे प्रजाजनों का भी बौध जगाओ। निमंत्रण स्वीकार हुआ फकीर राजधानी में आया। सम्राट ने उसके स्वागत के लिए बड़ा आयोजन किया। सारी राजधानी को फूलों और दीपों से सजाया गया। रास्ते में बहुमूल्य सुंदर कालीन बिछाए गए?। फकीर आया लेकिन सम्राट हैरान। वर्षा के दिन न थे, राहें सूखी पड़ी थीं। लेकिन फकीर के घुटने कीचड़ से सने हुए थे। पर सबके सामने कहना ठीक नहीं था तो सम्राट ने उसे राजमहल में ले गया।

एकांत में उसने पूछा कि अड़चन कहां आई?आपके पैर कीचड़ से भरे हैं। फकीर ने कहा-अड़चन का कोई सवाल नहीं। जब मैं आ रहा था तो लोगों ने मुझसे कहा कि तुम्हारा मित्र सम्राट अपना वैभव दिखाने के लिए राजधानी को सजा रहा है। वह तुम्हें झेंपाना चाहता है तो मैंने कहा कि देख लिए ऐसे झेंपाने वाले। अगर वह बहुमूल्य कालीन बिछा सकता है तो मैं फकीर हूं, कीचड़ भरे पैरों से उन कालीनो पर चल सकता हूं। मैं दो कौड़ी का मूल्य नहीं मानता।

जब उसने ये बातें कहीं तो सम्राट ने कहा-अब मैं निश्चिंत हो गया। मेरी जिज्ञासा शांत हुई। मेरी यही जिज्ञासा थी। फकीर ने पूछा-क्या जिज्ञासा थी? उसने कहा-यही कि मैं आपको सदा से जानता हूं। स्कूल में आपसे ज्यादा कोई अहंकारी न था। आप इतनी विनम्रता को उपलब्ध कैसे हो गए, यही मुझे संदेह था। अब मुझे कोई चिंता नहीं। आओ हम गले मिलें। हम एक ही जैसे हैं।

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