लक्ष्यहीन मनुष्य

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गुरु अपने शिष्यों के साथ जंगल में जड़ी-बूटियाँ खोज रहे थे। जब बहुत समय हो गया तो उन सभी को प्यास लगने लगी। वे जड़ी-बूटियों की खोज छोड़कर पानी की तलाश में लग गये। तलाशते-तलाशते वे जंगल के बाहर आ गये। वहाँ उन्हें एक खेत दिखाई दिया, जिसमें कई गड्ढे थे। एक शिष्य बोला, ‘गुरु जी! उधर देखिए। उस खेत में कई कुएं हैं। उनमें अवश्य ही पानी होगा। चलिए, वहाँ चलकर अपनी प्यास बुझायें। वे सभी उस खेत की ओर चल पड़े। खेत के नजदीक पहुँचकर उन्होंने देखा कि वे कुएँ नहीं सिर्फ कुछ ही गहरे गड्ढे थे और उनमें पानी भी नहीं था। सभी उदास हो गये। तभी गुरुजी को एक बात सूझी।

उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, ‘क्या आपमें से कोई इन गड्ढों का राज बता सकता है? क्यों एक ही खेत में कदम-कदम पर इतने सारे गड्ढे खोदे गये हैं। साथ ही इस खेत के मालिक का स्वभाव कैसा होगा?Ó सभी शिष्य सोचने लगे। एक शिष्य बोला, ‘गुरु जी! यह खेत निश्चित ही किसी शिकारी का होगा। वह बहुत ही चतुर है। उसने यहाँ इतने सारे गड्ढे इसलिए किये हैं ताकि जब भी कोई जानवर इस तरफ आये तो वह किसी न किसी गड्ढे में गिर पड़े और वह उसे पकड़ ले।

गुरुजी ने कहा, ‘नहीं ऐसा नहीं है। कुछ और सोचो। इस पर एक और शिष्य बोला, ‘गुरु जी ! मुझे लगता है कि खेत का मालिक बहुत ही समझदार है। उसने आगामी बारिश का पानी संचित करने के लिये ही ये गड्ढे खोदे होंगे, ताकि इस पानी का उपयोग वह साल भर कर सके। इस पर गुरुजी बोले, ‘नहीं, यह बात भी नहीं है। कोई और राज बताओ।


सभी शिष्य सोचने लगे। जब कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने गुरुजी से ही इसका राज बताने का आग्रह किया। गुरुजी बोले, ‘सामान्य-सी बात है। इस खेत का मालिक अस्थिर प्रकृति का इंसान है। जब उसे पानी की आवश्यकता हुई तो उसने कुआँ खोदना शुरु कर दिया। दस-बारह हाथ खोदने के बाद जब वहाँ पानी नहीं निकलता तो वह धैर्य खो देता और दूसरा गड्ढा खोदने लगता ।

इस प्रकार उसने कदम-कदम पर गड्ढे खोद दिये और कहीं से भी पानी नहीं निकला। यदि वह अपने स्वभाव की अस्थिरता पर काबू रखकर एक ही गड्ढे को गहरा करता जाता तो उसे कम परिश्रम में ही पानी मिल जाता। इसलिए तुम सबको भी इस घटना से सीख लेनी चाहिए कि जब भी काम हाथ में लो, उसे पूरा करके ही दम लो। भले ही तुम्हें कितनी ही कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े।

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