Home अक्षांश युवा लेखकों का स्तंभ : अफगानिस्तान मामले में सुरक्षा परिषद की भूमिका

युवा लेखकों का स्तंभ : अफगानिस्तान मामले में सुरक्षा परिषद की भूमिका

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आज जब अफगानिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सबसे अधिक आवश्यकता है, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका नगण्य प्रतीत होती है। जिस सुरक्षा परिषद का उद्देश्य विश्व शांति और सुरक्षा की स्थापना सुनिश्चित करना है, वह खुद निष्क्रिय सा दिखाई दे रहा है।

  • अभिषेक शर्मा, प्रतियोगिता परीक्षाओं के उम्मीदवार

आज अफगानिस्तान में जो हालात हैं, उनके आसार अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा के साथ ही दिखने लगे थे। लेकिन यह सब इतनी तेज गति से होगा इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। हम जान सकते हैं कि विज्ञान, तकनीक, राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषण और अनुमानों की आधुनिक धारणाओं को भी कैसे एक घटनाक्रम ने धता बता दी। अफगानिस्तान में जान बचाने के लिए हवाई जहाज से लटकते लोग, बाध्यकारी गैर मानवीय नियमों के विरुद्ध खड़ी महिलाएं और पूरे देश में भय, आशंका और अराजकता का माहौल, सवाल उठता है कि क्या इसे रोका जा सकता था। हां, संभवत इसे रोका या टाला जा सकता था, यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अपेक्षा के अनुसार कार्यवाही करती।

आज जब अफगानिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सबसे अधिक आवश्यकता है, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका नगण्य प्रतीत होती है। जिस सुरक्षा परिषद का उद्देश्य विश्व शांति और सुरक्षा की स्थापना सुनिश्चित करना है, वह खुद निष्क्रिय सा दिखाई दे रहा है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कई भू राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों के अदृश्य हितों ने ही सुरक्षा परिषद को कठोर कदम उठाने से रोका है।

चूंकि अमेरिका स्वयं अपने सैनिकों की वापसी चाहता है इसलिए अमेरिका से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह स्वयं सुरक्षा परिषद में तालिबान के विरुद्ध कठोर कार्यवाही और अमेरिकी सैनिकों की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव का समर्थन करे। मध्य एशिया में अपने निजी हित व प्रभुत्व को स्थापित करने और अमेरिकी प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से रूस और चीन ने सुरक्षा परिषद में चुप्पी साध रखी है। यहां तक कि दोनों स्थाई सदस्यों ने तालिबान के शासन को अनौपचारिक रूप से मान्यता भी प्रदान की है।

ऐसी स्थिति में इस बात की आशंका है कि यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तालिबान के विरुद्ध संयुक्त सैनिक कार्यवाही का प्रस्ताव लाया गया तो चीन या रूस इस पर निषेध अधिकार (वीटो) का प्रयोग कर सकते हैं। आज आवश्यकता है कि अफगानी जनता के हितों को सर्वोपरि मानकर विश्व समुदाय एकजुट हो, जिसका नेतृत्व सुरक्षा परिषद द्वारा किया जाए। लेकिन यह परिकल्पना तब तक सार्थक और चरितार्थ नहीं हो सकती, जब तक कि सुरक्षा परिषद में आमूलचूल सुधारात्मक परिवर्तन न किए जाएं।

सुरक्षा परिषद के वर्तमान स्वरूप और कार्यप्रणाली के संदर्भ में पूर्व दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा ने कहा था कि मेरा विश्वास है कि हम 40 के दशक में बने संगठनों और कायदे कानूनों से शासित नहीं हो सकते। दुनिया बदल रही है, हमें भी बदलने की आवश्यकता है। यह कथन वास्तविकता का परिचायक है। आज जरूरत है संयुक्त राष्ट्र में त्वरित सुधार करते हुए भारत वह ब्राजील जैसे देशों को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता देकर सुरक्षा परिषद को संतुलित किया जाए।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अफगान समस्या के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, यदि इसे नई शक्तियां और नए सुधार प्रदान किए जाएं। सुरक्षा परिषद को दुनिया का पुलिसमैन कहा जाता है लेकिन अफगानिस्तान के हालात पर यह केवल मूकदर्शक बनकर रह गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में सुरक्षा परिषद प्रभावी और परिवर्तित रूप में सक्रिय होगी, ताकि अफगानियों के हितों की रक्षा की जा सके और भविष्य में ऐसे और अफगानिस्तान बनने से होकर जा सकें।

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