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युवा लेखकों का स्तंभ: ‘सा विद्या या विमुक्तये’ को परिभाषित करती नई शिक्षा नीति

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  • सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास, युवा स्तंभकार

विष्णुपुराण में कहा गया है कि ‘तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् कर्म वही है जो बंधनों से मुक्त करे और विद्या वही है जो मुक्ति का मार्ग दिखाये। अतीत की कंदराओं में यदि हम झाँकें तो पाएंगे कि भारतीय शिक्षा पद्धति मानवीय मूल्यों पर आधारित थी। गुरुकुल पद्धति में ‘श्रुत’ अर्थात् सुनकर ज्ञान अर्जित करने की परंपरा रही है, जहाँ शिक्षा का महत्व केवल किसी विषय में पारंगत होने के साथ ही श्रेष्ठ व्यक्तित्व का विकास भी था। यही कारण है कि गुरुकुल परंपरा के छात्र अपने क्षेत्र में पारंगत होने के साथ ही महान व्यक्तित्व के प्रतिबिम्ब भी होते थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में लागू हो रही नयी शिक्षा नीति के पदार्पण में 34 वर्ष लगे।

देश की जनता, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और विभिन्न क्षेत्र के विद्वानों की सलाह के बाद निर्मित इस शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम के साथ ही व्यवहारिक ज्ञान और कौशल विकास में भी छात्र दक्षता अर्जित कर सकेंगे। भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार पाठ्यक्रमों में समावेशित इस नये प्रयोग में मानवीय मूल्य, योग, महिला सशक्तिकरण और नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया जाएगा।

स्कूली शिक्षा में किए गए बदलाव की बात करें तो पहले 10 + 2 की परंपरा थी, नई शिक्षा नीति में 5+3+3+4 की नीति को लागू किया गया है। 5+3+3+4 का अर्थ शैक्षणिक स्तर से है, जिसमें पांच का मतलब 3 साल प्री-स्कूल के और क्लास 1 और 2, उसके बाद 3 का मतलब क्लास 3, 4 और 5, उसके बाद 3 का मतलब क्लास 6, 7, 8 और उसके बाद के 4 का मतलब क्लास 9, 10, 11 और 12 है। यानी, अब बच्चे 6 साल की जगह 3 साल की उम्र में फॉर्मल स्कूल में जाने लगेंगे, इससे पहले 6 साल में पहली क्लास में जाते थे। वहीं, नई शिक्षा नीति लागू होने पर भी 6 साल का बच्चा ही पहली क्लास में कदम रखेगा, लेकिन पहले के तीन क्लास भी फॉर्मल एजुकेशन वाले ही माने जाएंगे। यानी प्ले स्कूल के शुरुआती शिक्षा स्तर को भी अब शिक्षा में जोड़ा जाएगा।


नई शिक्षा नीति में तीन भाषा के फार्मूले की बात कहीं गई है, जिसमें कक्षा 5 तक मातृभाषा/स्थानीय भाषा में पढ़ाई की बात की गई है। इसके साथ ही यह भी बात रखी गई है कि जहां संभव हो वहां कक्षा आठवीं तक भी इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है। संस्कृत भाषा के अलावा तमिल, तेलुगू, कन्नड़ जैसी कई भारतीय भाषाओं को भी इस फार्मूले में जगह दी गई है।

इस निर्णय से स्थानीय व मातृभाषाओं के विस्तार को भी बल मिलेगा। इसी तरह उच्च शिक्षा में नई शिक्षा नीति के तहत ग्रेजुएशन में छात्र 4 साल का कोर्स पढ़ेंगे, जिसमें बीच में पढ़ाई छोडऩे की गुंजाइश भी नई शिक्षा नीति के तहत दी गई है। इसके मुताबिक पहले साल में पढ़ाई छोडऩे पर सर्टिफिकेट मिलेगा। दूसरे साल के बाद एडवांस सर्टिफिकेट मिलेगा और तीसरे साल के बाद डिग्री और 4 साल के बाद डिग्री के साथ शोध भी होगा।

दरअसल, नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद छात्रों के पास ज्यादा विकल्प है। कभी – कभी ऐसा होता है कि विद्यार्थी ने यदि किसी विषय में दाखिला ले लिया और आगे वे अपनी पढ़ाई जारी नहीं रखकर दूसरे पाठ्यक्रम में प्रवेश चाहते हैं, तो उनका पहला वर्ष बर्बाद नहीं होगा, क्योंकि नयी शिक्षा नीति के तहत एक वर्ष का भी सर्टिफिकेट विद्यार्थी को दिया जाएगा। छात्रों को दूसरा फायदा यह है कि ग्रेजुएशन की पढ़ाई दो साल बाद छोडऩे के बाद भी उसकी डिग्री छात्र को मिलेगी।

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