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हिन्दी खतरे में नहीं, यह देश की सबसे तेजी से उभरती हुई भाषा

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चंद बुद्धिजीवियों द्वारा वैमनस्य भाव से फैलाए जा रहे भ्रम को कि देश में हिंदी का आधार कमजोर होता जा रहा है, को ही सच मान बैठे हैं जबकि आंकड़ों की मानें तो हिंदी देश की सबसे तेजी से उभरती भाषा है। लेकिन हमारे सामने एक ऐसा भ्रमजाल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि हिंदी खतरे में है।

  • पुरु शर्मा, छात्र, मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय, भोपाल

हिंदी देश को जोडऩे वाली महत्वपूर्ण भाषा हैं। यह हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति एवं इतिहास की भाषा है। हिंदी भारतीय जनमानस के अंतस से निकली अनुभूति की शाब्दिक अभिव्यक्ति है। परंतु वर्षों की गुलामी ने हमारी मानसिकता, अस्मिता और स्वाभिमान को इस कदर कुंठित कर दिया हैं कि आज हम अपनी मातृभाषा हिंदी को हीन मानकर स्वयं अपनी ही स्वतंत्रता का मजाक उड़ा रहे हैं। आज हम अंग्रेजी भाषा के मोहपाश में इस कदर अंधे हो चले हैं कि हिंदी को पिछड़ों की भाषा बताने पर तुले हैं। जबकि हिंदी देश के 55 करोड़ लोगों द्वारा बोले जानी वाली विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है।

देश में प्रति वर्ष हिंदी दिवस को हिंदी की अघोषित बरसी के रूप में मनाने का चलन आ गया है। सरकार एवं संगठनों द्वारा आयोजित होने वाले हिंदी सप्ताहों और पखवाड़ों में हिंदी के प्रचार-प्रसार, प्रगतिशीलता व विकास पर कार्ययोजना बनाने के बजाय उसे श्रद्धांजलि सभा सा बना दिया जाता है जहाँ तमाम सरकारी तामझाम के साथ हिंदी के अध्यापक, प्रचारक-विचारक, तथाकथित बुद्धिजीवी हिंदी की कथित बदहाली पर सामूहिक रुदन-गान कर, हिंदी के अस्तित्व के खतरे में होने की खोखली भविष्यवाणियां करते नजर आते हैं। जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट है। सूचना तकनीक के दौर ने हमारे चारों ओर इतना कुहासा पैदा कर दिया है कि हम वास्तविकता की अनुभूति नही कर पा रहे हैं।

चंद बुद्धिजीवियों द्वारा वैमनस्य भाव से फैलाए जा रहे भ्रम को कि देश में हिंदी का आधार कमजोर होता जा रहा है, को ही सच मान बैठे हैं जबकि आंकड़ों की मानें तो हिंदी देश की सबसे तेजी से उभरती भाषा है। लेकिन हमारे सामने एक ऐसा भ्रमजाल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि हिंदी खतरे में है और इसके प्रभाव में आकर हम अपनी ही भाषा को हीन व दरिद्र समझने लगे है। जबकि जनगणना के आधिकारिक आँकड़े बताते है कि हिंदी कितनी तेजी के साथ देश में फ़ैल रही है।

किसी भी भाषा की स्थिति का आकलन करने के लिए भाषा वैज्ञानिक कई आधारों को ध्यान रखते हैं जैसे कि भाषा का स्थानांतरण अगली पीढ़ी तक हो पा रहा है या नही? भाषा बोलने वाला समुदाय अल्पसंख्यक है या बहुसंख्यक? भाषा को सरकारी संरक्षण प्राप्त है कि नही? भाषा शिक्षा का माध्यम है या नही? हिंदी के बढ़ते प्रभाव को समझने के लिए हम दशकीय वृद्धि दर का अध्ययन करते है और पाते है कि हिंदी लगातार विस्तार पा रही है। 1971 में जहाँ हिंदी बोलने वालों का प्रतिशत 36.99 था जिसमे दशक-दर-दशक वृध्दि होती रही। 1981 में यह प्रतिशत 38.74 था, 1991 में 39.29 प्रतिशत था, 2001 में 41.30 प्रतिशत था और 2011 में हिंदी बोलने वालों का प्रतिशत 43.63 था। आकंड़ों से स्पष्ट है कि हिंदी खतरे में नही हैं बल्कि लगातार उसका क्षेत्र बढ़ता जा रहा है।

हिंदी देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है और लगातार अपना विस्तार पा रही है। आज वह संपर्क और सर्व स्वीकार भाषा बन गई है। जिन पूर्वोत्तर तथा दक्षिण भारत के लोगों में दशकों पहले हिंदी के विरुद्ध गुस्सा व वैमनस्य भाव था, अब वह भी हिंदी को स्वीकारने लगे है। पूर्वोत्तर तथा दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है। दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी उग्र आंदोलनों से उभरे एम् करुणानिधि, जो लगातार हिंदी भाषा के बढ़ते वर्चस्व के विरोधी रहे, वह अपनी किताब का अनुवाद तमिल से हिंदी में करवा चुके है। कभी जिस तमिलनाडु से हिंदी के विरुद्ध हिंसक आंदोलनों का धुआं उठता था आज उसी तमिलनाडु की भूमि में हिंदी की गूँज सुनाई दे रही है और आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वहाँ 39 लाख लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया है। यह हिंदी का बढ़ता प्रभाव है। यह हिंदी के समावेशी संस्कृति का परिणाम है।

हालांकि यह सत्य है कि वैश्वीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में हिंदी के सामने कई चुनौतियाँ मुँह खोले खड़ी हैं। हमें हिंदी को मनोरंजन और सूचना की भाषा से ज्ञान व प्राद्योगिकी की भाषा बनाना होगा जिससे हिंदी की बिंदी विश्व के ललाट पर चमकती रहे। अंतत: हिंदी को मजबूत और ग्राह्य होना होगा, इतना मजबूत की ये अन्य वैदेशिक भाषायी चुनौतियों का सामना कर सके।

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