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यात्रा-उज्जैन: धर्म की गंगा में गोते तो इतिहास की गलियों में गलबहियां

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जय तिवारी

देवभूमि से होने के कारण दीपक की आस्था भोले में अधिक थी और वह आया भी देहरादून से था। प्रिंस और राहुल बिहार के अलग-अलग कोने से आए थे। ये युवा मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन करना चाहते थे। यह देश के बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है। मैं इनके दर्शन का माध्यम था सो कहीं न कहीं मैं जिम्मेदारी महसूस कर रहा था कि दर्शन अच्छे से हो सकें। मेरी भी स्नातक पाठ्यक्रम के दौर से ही यह पसंदीदा जगह थी। ऐसी जगह जहां जाकर वह शांति का अनुभव हो सके, यही सोचता था। महाकवि कालिदास की नगरी जो कभी थी अवंतिका से अच्छी जगह कौन हो सकती है।

सावन का महीना और बाबा के दर्शन अद्भुत। भोपाल से उज्जैन के लिए काफी ट्रैन मिलती हैं जो 4 घंटे में पहुंचा देती हैं। मगर हमने कार से 191 किमी का सफर कब पूरा कर लिया, पता ही नही चला। ऑनलाइन टिकट के चक्कर में दो दिन निकलने के बाद यह सफर शुरू हुआ था, तब भी हाथ खाली ही थे। टिकट मिला नहीं था, सावन में महाकाल के दर्शन का टिकट मिलना वो भी ऑनलाइन, कठिन होता है। खैर, भोले का नाम लेकर सफर शुरू हो गया था। शाम पांच बजे हम उज्जैन में शिप्रा के तट पर खड़े होकर मौन में एक दूसरे को निहार रहे थे। ये वही शिप्रा है जिसके किनारे हर बारह साल में सिंहस्थ नाम से कुंभ का आयोजन होता है। कुंभ के कारण विकास की यहां ऐसी बयार बही है कि शहर बड़ा खूबसूरत हो गया है। सावन में यह कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रहा था।

सड़क के ऊपर कारपेट डला था। हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। ऐसा लग रहा है कि कोई मित्र यहीं बस जाए तो आना जाना लगा रहे। कहते हैं कि कई लोग अपनी नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद यहीं ठिकाना बनाना पसंद करते हैं। बहरहाल ,हमने पहुंचकर सबसे पहले भगवान कृष्ण की शिक्षा स्थली देखना चाहा। मन में कृष्ण के साथ सुदामा और उनकी शिक्षा-दीक्षा के दृश्य तैर रहे थे। सांदीपनि आश्रम के बाद हमने मंगलनाथ मंदिर के दर्शन किए जहां पुराणों के अनुसार मंगल ग्रह का जन्म हुआ था। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ करवाने आते हैं। कर्क रेखा पर स्थित इस मंदिर को देश का नाभि स्थल माना जाता है और मंगलनाथ के दर्शन करते करते घड़ी में बज गए आठ। और यह इस बात का प्रमाण है कि अब वापस होटल चलो क्योंकि सारे मंदिरों के कपाट आठ बजे बंद हो जाते हैं। लौटकर हम शिप्रा किनारे बैठ गए।

अगले दिन पांचों तैयार हुए उस घड़ी के लिए, जिसके लिए हम सभी यहां आए थे यानी महाकाल के दर्शन, लग गए लाइन में। खास बात यह है कि सारे श्रद्धालु प्रशासन की कोविड गाइडलाइन का पालन करते हुए देखे जा सकते हैं। परिसर एक दम साफ सुथरा है। एक समय यह देश के सबसे साफ-सुथऱे धर्मस्थल परिसर में भी शुमार हो चुका है। करीब आधे घंटे बाद महाकाल के दर्शन का वह क्षण आ गया है और उस क्षण में न हमें अतीत की चिंता रही और न भविष्य की। बाबा के दर्शन हो गए।

प्रांगण के बाहर निकलते ही सम्राट विक्रमादित्य का विशाल सिंहासन हमें आकर्षित करने लगा। ये वही सम्राट हैं जिन्होंने 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया था। जब हम करीब पहुँचे तो लगा मानो साक्षात विक्रमादित्य विराजमान हैं। शहर की सड़कों के नाम विक्रमादित्य के नवरत्नों पर हैं। भर्तृहरि से लेकर सिंधिया राजवंश तक इतिहास की कई गलियां यहां खुली हैं। घूमते-घूमते हम इतिहास की कई गहरी परतों में डूब गए।

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