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अपने तरीके से जीने का मोल

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  • प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

हम सभी स्वयं की बनाई हुई, अपनी छोटी सी दुनिया में रहते हैं, फिर भी हम सब इस ब्रह्मांड में एक परिवार की तरह साथ हैं। हम सभी एक ही समय, एक ही चरण और एक ही क्षण से गुजर रहे हैं। हर रोज एक समान जीवन भी जीते हैं। फिर भी, केवल एक ही चीज है जो हम सभी प्राणियों को, खासकर मनुष्यों को एक-दूसरे से अलग करती है, जिसकी वजह से हमारे जीवन में भिन्नता है। एक व्यक्ति अपने जीवन से अत्यधिक संतुष्ट और सुखी है, दूसरा असंतुष्ट और चिंतित है।

एक हर्षित और आनंदित है, तो दूसरा उदास है। एक व्यक्ति नैतिकता का पालन कर रहा है और कानूनी रूप से व्यापर कर रहा है, अत: निर्भीक है। वहीं, दूसरा भ्रष्ट है, इसलिए सुकून से कोसों दूर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों में, दोनों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। नैतिक, ईमानदार और मेहनती व्यक्ति को लगता है कि वह हर उपलब्धि हासिल कर निरंतर प्रगति कर रहा है, अपने सपने को पूरा कर रहा है; जबकि अनैतिक व्यक्ति सदैव अनिश्चितता वाला जीवन जीते हुए, भय के साथ पीछे मुड़ कर अपना इतिहास देखता है।

अपने चारों ओर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि किसी के जीवन में इसके अतिरिक्त कोई अंतर नहीं है। हम में से प्रत्येक को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है; हम में कुछ से आगे निकल जाते हैं, कुछ विफल हो जाते हैं। ऐसी स्थिति की भिन्नता को स्वीकार करने के बजाएइसे एक समस्या या चुनौती के रूप में लेने से हमारे अंतर्मन और मस्तिष्क में कड़वाहट और निंदा का भाव आने लगता है। जीवन मात्र सफलताओं या लक्ष्यों को प्राप्त करने के बारे में नहीं है।इसी प्रकार,चुनौतियाँ हमारी क्षत्रु नहीं हैं, क्योंकि सच्चा शत्रु तोसच्चे मित्र की तरह,हमारे ही अन्दर होता है। अत: आवश्यक है कि हम हमारा जीवन ‘अपने तरीके से जिएं – स्वयं के मित्र बनकर, क्षत्रु के रूप में मौजूद अपनी नकारात्मकता, अनिश्चितता और भय को परास्त कर। लेकिन कैसे?

इस प्रश्न का उत्तर शास्त्र ज्ञानऔर पंथों का वर्णन किए बिना देना काफी जटिल है, क्योंकि इसमें एक और सवाल समाहित है: यदि हमारे पंथ हम सभी के लिए जीने का एक सही तरीका इंगित करने का काम करते हैं,तो फिर हम ‘अपने तरीके से अपने जीवन को कैसे जी सकते हैं? आखिर ‘अपने तरीके से जीने का क्या अर्थ है? यहां तक कि अगर आप अपने जीवन को’अपने तरीके से जीने का प्रबंधन कर भी लेते हैं, तो भी क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि आप बिना किसी पछतावे के यह सम्पूर्ण जीवन जी सकेंगे? क्या यह तय हो सकेगा कि आपका वर्तमान में जीवन जीने का तरीका और आपकी आने वाले 20 वर्षों में बदलने वाली जीवनशैली एक-सी होगी? अगर अलग हुई तो इसका क्या समाधान होगा?

मेरे जीवन में मैंने भी ऐसे ही कुछ प्रश्नों के ज़रिए स्वयं का आत्मविश्लेषण किया जब मैं कॉर्पोरेट जगत छोड़ कर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढऩे पर, ‘अपने तरीके से जीने पर विचार कर रहा था। आज भी,जब भी मेरे मस्तिष्क में कोई संदेह उत्पन्न होता है तोमैं खुद से वही प्रश्न पूछता हूँ। क्या मैं इस बदलाव से, या इस मार्ग पर आगे बढऩे से खुश, संतुष्ट और निश्चिन्त हो जाऊंगा? क्या मैं वास्तव में कोई परिवर्तन चाहता हूँ, और यदि हाँ, तो क्यों?

क्या मैं इस परिवर्तन का निर्णयमात्र स्वयं के लिए ले रहा हूँ, या सामाजिक स्थिति, अधिक विलासिता का मोह, सामाजिक छवि में सुधार की आकांक्षा, अधिक शक्ति प्राप्त करने का लोभ, आदि इसके महत्वपूर्ण कारक हैं?इन प्रश्नों के साथ ही, मैंने मेरे निर्णय से उभरने वाले परिणामों पर भी ध्यान दिया, कि इसका सबसे बुरा नतीजा क्या हो सकता है? क्या मैं किसी को किसी भी प्रकार से हानि पहुँचाऊँगा? क्या मेरा ऐसा करना सही होगा?

जब भी हम किसी चुनौती के बीच बदलाव चाहते हैं, अर्थात ‘अपने तरीके से जीवन जीना चाहते हैं, तो पहले यह समझें कि ‘आप होने का क्या मतलब है अर्थात आपका स्वयं का क्या उद्देश्य है। ‘आप को क्या खास बनाता है, ‘आप ने जीवन में कौन से सबक सीखे हैं और ‘आप को क्या लगता है कि आपको किन मूल्यों का पालन करना चाहिए।


‘अपने तरीके से के लिए आवश्यक है कि हम भविष्य पर ध्यान दें और अतीत में जीना बंद करें। जो बीत चुका, उससे अनुभव लें, और बाकि सब भूल जाएं, क्योंकि उसका कोई अर्थ नहीं। यदि वह अतीत सुखद था, तो उसे स्मृति में रखें और उसके लिए आभारी रहें।अन्यथा, अप्रियता को छोड़ कर निष्पक्ष रूप से नए मार्ग की ओर अग्रसर हो जाएं।


‘अपने तरीके से जीने के लिए आवश्यक है कि जिम्मेदार बनें- स्वयं के निर्णयों के लिए – और समझें कि जिम्मेदारी एक बड़ी अवधारणा है। यह किसी स्थिति के लिए उपयुक्त रूप से प्रतिक्रिया करने की व्यक्ति की क्षमता है। इसका माप बाहरी भौतिक वस्तुओं से नहीं बल्कि आंतरिक समृद्धि और स्वयं की स्थिरता से होता है। इसका मतलब है कि चुनौती के क्षण में आपकी जो भावनाएँ हैं -विशेष रूप से अप्रिय भावनाएँ -चाहे वह भय या ईर्ष्या या सरल द्वेष हो – उन्हें अपने लिए भी सही और नयायपूर्णसिद्ध की कोशिश किए बिना पहले स्वीकार करें।


सवाल यह नहीं है कि एक परिस्थिति में ‘सही का चुनाव कितना कठिन है। बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि क्या आप अपने द्वारा चुने गए विकल्पों के साथ संतुष्टि से जी सकते हैं। यह मायने नहीं रखता कि जब कोई स्थिति हमारी प्रतिक्रिया की मांग करती है तो हम प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं, अपितुमहत्वपूर्ण यह है कि हम उस समय जो भी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं, क्या वह हमें शांति, सुकून और संतुष्टि की भावना दे सकेगी। ‘अपने तरीके से जीने का यह चुनाव, यह निर्णय,जीवन सभी विकल्पों के बारे में है- जैसा कि कहा गया है, ‘आपके पास हमेशा एक विकल्प होता ही है।

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