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विश्व संस्कृत दिवस : विज्ञान और रोजगार में संस्कृत की बड़ी भागीदारी

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संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है। इसकी खूबी यह है कि जैसा इसे लिखा जाता है, वैसा ही बोला जाता है। इसे कंप्यूटर की कृत्रिम बुद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्योंकि नासा के वैज्ञानिकों भी प्रमाणित किया है कि संस्कृत विश्व की सबसे अधिक स्पष्ट भाषा है। इसका शब्दकोश बहुत विशाल है। इसमें 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है।

प्रमोद भार्गव

आमतौर से भारत ही नहीं दुनिया में अंग्रेजी को विज्ञान और रोजगार की भाषा माना जाता है। किंतु अब यह मिथक व्यापक स्तर पर टूटता दिख रहा है। नई शिक्षा नीति का यदि निष्पक्षता और ईमानदारी से पालन होता है तो वह दिन दूर नहीं जब हम संस्कृत समेत अन्य भारतीय भाषाओं को पूर्ण रूप से रोजगार की भाषाएं बना देने का पुनीत लक्ष्य हासिल कर लेंगे। क्योंकि अब संस्कृत से धन और रोजगार पैदा करने के अवसर निरंतर बढ़ रहे हैं। आयुर्वेद,योग, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और वास्तुशास्त्र से जुड़े लाखों लोग संस्कृत के बूते अपनी आजीविका चला रहे हैं।

रामायण व भागवत कथा के प्रवचनकर्ता और पुजारी भी संस्कृत से ही रोजगार पाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है कि जो लोग सरकारी शिक्षा-संस्थानों में संस्कृत के अध्यापक रहते हुए अध्यापन करा रहे हैं, वे अपनी आजीविका के इस उपाय को गरिमापूर्ण मानते हुए प्रचारित ही नहीं कर पाते हैं? चूंकि आयुर्वेद और योग चिकित्सा विज्ञान के विषय के रूप में दुनिया में स्थापित हो चुके हैं, बावजूद हम संस्कृत को विज्ञान और रोजगार की भाषा कहने में सकुचाते हैं। गोया इन विषयों और व्यवसायों से जुड़े लोगों को हीनग्रंथी से मुक्त होकर संस्कृत को रोजगार के फलक पर स्थापित करने की जरूरत है। अब सुपर एवं क्वांटम कंप्यूटर की भाषा संस्कृत को बनाए जाने के प्रयास नासा कर रहा है।

देश के शीर्ष अभियांत्रिकी संस्थानों में आमतौर पर गणित और विज्ञान की पढ़ाई अंग्रेजी में होती है, लेकिन अब उस कक्षा की कल्पना कीजिए, जिसमें तकनीकी विषयों के प्राचीन पाठ संस्कृत में पढ़ाए गए। यह सुखद एवं उल्लेखनीय पहल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर ने की थी। संस्थान ने देश के प्राचीन ग्रंथों में शताब्दियों पहले संजोए गए गणितीय और वैज्ञानिक ज्ञान से वर्तमान पीढ़ी को अवगत कराने के लिए अपने किस्म का ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू किया था, जिसमें प्रतिभागियों को संस्कृत में पढ़ाया गया है।

आईआईटी मुंबई के दो प्राध्यापकों ने संस्कृत में गणित का शास्त्रीय पाठ पढ़ाया। इस पाठ्यक्रम में 750 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए थे। दरअसल संस्कृत में रचे गए भारत के प्राचीन ग्रंथों में चिकित्सा, योग, गणित और विज्ञान के ज्ञान की समृद्ध विरासत है, लेकिन वर्तमान पीढ़ी के ज्यादातर लोग इस ज्ञान के इस सुनहरे अतीत से अनभिज्ञ हैं।

अब तक यह माना जाता रहा है कि संस्कृत भाषा के ग्रंथों में गणित व विज्ञान नहीं है। इसमें दुनिया में हो रहे अनुसंधानों का भी उल्लेख नहीं है। दरअसल स्वतंत्रता के बाद से ही भारत अपनी इस विरासत का लाभ नहीं उठा पाया है। तथाकथित वामपंथियों के धर्मनिरपेक्षतावादी इकतरफा विचारों के चलते संस्कृत के ग्रंथों को ही नहीं, भाषा को भी सांप्रदायिक मान लिया गया। जबकि अनेक विदेशी विद्वानों ने संस्कृत को एकमात्र जीवित भाषा माना है। यदि यह भाषा जीवित न होती तो मैकाले इसे नष्ट करने के कानूनी उपाय नहीं करता? और जर्मन विद्वान मैक्समूलर करीब पौने दो सौ साल पहले संस्कृत के ग्रंथों की हजारों पांडुलिपियां अपने देश न ले गया होता?

अच्छी बात है कि विज्ञान के नए शोधों में भारतीय एवं पश्चिमी विधियों को जोडऩे की कोशिश हो रही हैं। देश के पहले सुपर कंप्यूटर परम् के निर्माता एवं देश में सुपर कंप्यूटिंग की शुरूआत से जुड़े सी-डेक के संस्थापक डॉ. विजय भटकर का कहना है कि ‘सत्य को जानने के लिए कभी पश्चिमी शोधकर्ता स्मृति, शरीर और दिमाग पर निर्भर रहते थे, लेकिन विज्ञान की नवीनतम ज्ञान-धारा क्वांटम यांत्रिकी अर्थात अति सूक्ष्मता का विज्ञान आने के बाद उन्होंने चेतना पर भी बात शुरू कर दी है।

दरअसल अब उन्होंने अनुभव कर लिया कि भारतीय भाववादी सिद्धांत को समझे बिना चेतना का आकलन संभव नहीं है। जबकि अब तक पश्चिमी विज्ञान का पूरा ध्यान प्रकृति बनाम पदार्थ पर ही केंद्रित रहा है। इसीलिए अब कंप्यूटर की भाषा को और बारीकी से समझने के लिए नासा जैसा विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान पाणिनी व्याकरण की अष्टाध्यायी का अध्ययन कर रहा है।


संस्कृत को कंप्यूटर की कृत्रिम बुद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्योंकि नासा के वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि संस्कृत विश्व की सबसे अधिक स्पष्ट भाषा है। इसमें जैसा बोला जाता है, हूबहू वैसा ही लिखा जाता है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि इसका शब्दकोश बहुत विशाल है। इसमें 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द हैं। नासा के पास ताड़-पत्रों पर लिखी संस्कृत की साठ हजार पांडुलिपियां उपलब्ध हैं।

इन पर व्यापक शोध चल रहा है। एलियन से संवाद स्थापित करने के लिए भी नासा और अन्य खगोलीय संस्थानों ने संस्कृत के वाक्य अंतरिक्ष में भेजे हैं। हालांकि एलियन की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला है। एक समय नासा के वैज्ञानिकों के द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों को भेजे गए संदेश पलट जाते थे, इस कारण उनका अर्थ भी बदल जाता था। इसका समाधान अब संस्कृत और इसे लिखी जाने वाली देवनागरी लिपि में खोज लिया गया है।


दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ‘ऋग्वेद संस्कृत में लिखी है। ज्यामिति, बीज गणित और ज्योतिष व खगोल विद्या पर सबसे प्राचीन किताबें संस्कृत में ही हैं। अमेरिकी हिंदू विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार संस्कृत में बात करने से मनुष्य शरीर का तंत्रिका-तंत्र सक्रिय रहता है। इसका सकारात्मक प्रभाव रक्तचाप और मधुमेह को नियंत्रित करता है।

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