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विश्व पर्यावरण दिवस : पर्यावरण के प्रहरी हमारे अन्नदाता

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  • 5 जून से शुरु हो रहा है पारिस्थतिकी तंत्र को बहाल करने का वैश्विक दशक

    भारत दुनिया के उन सत्तर देशों में सम्मिलित है जो उपजाऊ धरती को रेगिस्तान बनने से रोकने का अभियान चला रहे हैं। अगले आठ सालों में हमें भूमि क्षरण रोकने का लक्ष्य हासिल करना है। पारिस्थिक तंत्र को सुधारने की कई पहल में देश अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
  • नरेंद्र सिंह तोम


आज हम वर्ष 2021 का विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं। इस दिवस से पारिस्थितिकी तंत्र (ईकोलॉजी सिस्टम) की बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक का शुभारंभ भी हो रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस हमारे लिए केवल एक रस्म-भर नहीं है, बल्कि यह खास दिन पर्यावरण के महत्व को उजागर करने और लोगों को यह याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि प्रकृति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व वाले देश के रूप में भारत के लिए परंपरागत रूप से जीवन जीने का एक तरीका रहा है और कई समुदाय अभी भी प्रकृति को एक मार्गदर्शक शक्ति के रूप में देखते हैं। यह दिवस भारत सरकार की पहल पर, इस बात पर मंथन करने का एक विशेष अवसर है कि देश कैसे कई संस्कृतियों व परंपराओं पर आधारित कार्यक्रमों के साथ पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

पेड़ उगाना, हरा-भरा शहर, फिर से जंगल बनना, खान-पान में बदलाव या नदियों व तटों की सफाई, ये पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की प्रक्रियाएं हैं। इसमें उन बातों को भी शामिल करना आवश्यक है, जिन्हें हम भूल चुके है अथवा जो नष्ट प्राय: हो चुकी हैं, साथ ही साथ स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी जरूरी हैं। बहाली कई तरह से हो सकती है। पारिस्थितिकी तंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस करना हमेशा संभव नहीं होता है। हमें अभी भी उस जमीन पर खेत और बुनियादी ढांचे की जरूरत है, जो कभी जंगल था और यही प्रकृति की जरूरत है।

पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के हस्तक्षेप के आर्थिक लाभ निवेश की लागत से कई गुना अधिक हैं। हर पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल किया जा सकता है- जंगल, खेत, शहर, आर्द्रभूमि और महासागर। सरकारों और विकास एजेंसियों से लेकर व्यवसायों, समुदायों और व्यक्तियों तक, लगभग किसी के द्वारा भी बहाली की पहल शुरू की जा सकती है।

आइए, देश में स्वच्छता अभियान की अलख जगाने वाले, पर्यावरण की रक्षा के सेनापति, हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार द्वारा की गई कुछ प्रमुख पहलों पर विचार करें, जिन्हें विकास की प्रक्रिया में पर्यावरणीय सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रारंभ किया गया है। किसी न किसी रूप में भूमि का क्षरण गंभीर चिंता का विषय है, जो कृषि की स्थिरता को खतरे में डालता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश एवं बहते पानी के कारण भूस्खलन और वनों की कटाई, जंगल व अन्य मैदानी क्षेत्रों में अतिचारण और दोषपूर्ण सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण मिट्टी, पानी व हवा के कटाव को उजागर करती है।

भारत उन 70 देशों में से एक है, जो मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में शामिल हैं, जिसने कन्वेंशन की भूमि क्षरण तटस्थता रणनीति के एक भाग के रूप में आगामी आठ सालों में यानी वर्ष 2030 तक भूमि क्षरण तटस्थता लक्ष्यों तक पहुंचने का वचन दिया है। इसके एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में, भारत ने भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ भूमि क्षरण व मरूस्थलीकरण से निपटने के लिए कई नीतियों-कार्यक्रमों को लागू किया है।

सरकार आर्गेनिक/ प्राकृतिक खेती को बहुत ज्यादा बढ़ावा दे रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना/ भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना/जीरो बजट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा हैं, जिससे निश्चित ही पर्यावरण को असीमित फायदा होगा। पवित्र गंगा नदी की शुद्धता केंद्र सरकार की प्राथमिकता रही है, गंगा के किनारे जितनी खेती है, उसे आर्गेनिक/ प्राकृतिक में बदलने की योजना क्रियान्वित की जा रही है ताकि कोई भी केमिकल- फर्टिलाइजर वगैरह गंगा नदी में न जाए। जल-पर्यावरण की दिशा में यह कदम मील का पत्थर हो सकेगा।

हमारे देश के दूर-दराज के वनवासी इलाकों में, जहां बहुतायत में आदिवासी वर्ग के लोग स्थानीय खेती करते हैं और वे अधिकांशत: खाद का इस्तेमाल नहीं करते हैं अथवा कुछ जगह करते भी हंै तो बहुत कम करते हैं, उन पूरे वृहद क्षेत्रों को आर्गेनिक सर्टिफिकेशन के लिए हमारे प्रयास आगे बढ़ रहे हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जैसा क्षेत्र इसका एक उदाहरण है। इससे ये क्षेत्र प्राकृतिक खेती के रूप में ही उपयोग किए जाएंगे, सर्टिफिकेशन के फलस्वरूप किसानों की आय बढ़ेगी।

नए नैनो फर्टिलाइजर की आमद भी खेती-किसानी में हुई है, जिनके कारण सामान्य फर्टिलाइजर की खपत कम होगी, जिससे निश्चय ही खेतों की ऊर्वरा शक्ति बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के बीच टिकाऊ कृषि के लिए सरकार द्वारा अपनाई जा रही सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक कृषि में जल उपयोग दक्षता में वृद्धि करना है।

सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों के माध्यम से सटीक जल उपयोग ने खेत के स्तर पर जल पदचिह्न को कम करने में बहुत बड़ा वादा दिखाया है। माइक्रो इरिगेशन का बजट पहले 5 हजार करोड़ रुपए का था, इस वित्तीय वर्ष के बजट में आवंटन बढ़ाकर केंद्र सरकार ने दोगुना कर दिया है और अब 10 हजार करोड़ रुपए के बड़े कोष से सूक्ष्म सिंचाई द्वारा खेतों को, अन्नदाताओं को काफी लाभ होगा।

इसके कारण, भूमिगत जल कम निकाला जाएगा, जिससे सीधे-सीधे पर्यावरण को अत्यधिक फायदा होगा। बायोस्टिमुलेंट्स को लेकर भी सरकार ने नई नीति बनाई है, ताकि क ेमिकल-खाद का कम उपयोग हो और खेतों की स्थिति सुधरे। मक्का से एथेनाल बनाने की योजना पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में सतत् काम चल रहा है, जिससे आयात कम होने के साथ ही पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी आने से भी पर्यावरण की बहुत रक्षा होगी।

हमारा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भी कृषि आय बढ़ाने और गैर-कृषि रोजगार के सृजन के अलावा संरक्षण और प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे में ऑन-फार्म और ऑफ-फार्म निवेश के माध्यम से कृषि और संबद्ध क्षेत्र के उत्पादन के बाद के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खाद्य अपव्यय,पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि करता है, जिससे काफी हद तक बचा जा सकता है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने अपनी योजनाओं के माध्यम से फार्म गेट बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रोत्साहित करके, खाद्य प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने और विभिन्न कृषि-बागवानी उत्पादों की मूल्य श्रंखला को मजबूत करके, फसल के बाद के नुकसान में कमी की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2 लाख नए उद्यमों को अपग्रेड करने और 9 लाख उद्यमियों को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना (पीएमएफएमई) के प्रधानमंत्री औपचारिकीकरण की नई पहल, कृषि और संबद्ध उत्पादों के सतत प्रसंस्करण को बढ़ावा देने और पर्यावरण को आगे बढ़ाने में एक लंबा सफर तय करेगी।

खाद्य उद्योग की अत्यधिक विविध प्रकृति के कारण, अक्षम प्रसंस्करण तकनीक, हैंडलिंग और पैकेजिंग संचालन से अपशिष्ट पैदा होते हैं, जिनका यदि उपचार नहीं किया जाता है तो प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। पिछले पांच वर्षों के दौरान, मंत्रालय ने 50 एकड़ क्षेत्र में फैले विशाल मेगा फूड पार्कों से लेकर छोटी मूल्य श्रंखला लिंकेज परियोजनाओं तक लगभग 800 खाद्य प्रसंस्करण अवसंरचना परियोजनाओं को सहायता प्रदान की है। नवीन प्रसंस्करण तकनीकों को अपनाना, जल उपचार संयंत्र सहित अपशिष्ट निपटान तंत्र और उपचारित पानी का पुन: उपयोग, अपशिष्ट उपचार संयंत्र के साथ-साथ ठोस अपशिष्ट निपटान संयंत्र मेगा फूड पार्क, कृषि प्रसंस्करण क्लस्टर आदि की प्रमुख योजनाओं के तहत सहायता के लिए अनिवार्य है।

(लेखक भारत सरकार में कृषि मंत्री हैं। )

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