स्वाधीनता संग्राम में महिलाएं

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स्वातंत्र्य संग्राम में आधी दुनिया ने भी कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं ने हर मोर्चों पर संघर्ष किया। नारी शक्ति ने हीं राष्ट्रीय अस्मिता के लिए प्राण देने वाले महापुरुषों को जन्म दिया और अपनी सशक्त भूमिका के नए आयाम भी स्थापित किए हैं। भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की महानायक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता संघर्ष को नई परिभाषा दी। क्रांति के इन आरंभिक अवदानों में ही महिलाओं ने प्रत्यक्ष युद्ध और युद्ध नीति दोनों का संचालन करके दुनिया को चौंका दिया। 1857 ही नहीं अपितु भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय संघर्ष में महिलाओं का एक लंबा इतिहास है। मध्यकालीन भारत के अंधकारपूर्ण युग में भी महिलाओं ने दासत्व को सबसे पहले ललकारा। इसी शताब्दी में रानी दुर्गावती ने गोंडवाना की धीर-धवला पुण्य भूमि को अपने रण कौशल, विलक्षण प्रतिभा, अदम्य उत्साह और वीरता से गौरवान्वित किया। 18 वीं शताब्दी में रानी अहिल्याबाई राज्य सुरक्षित रखने के साथ राज्य सुधार और न्याय की प्रतिमूर्ति बन गई। इसी क्रम में राजमाता जीजाबाई की वीरता अनुकरणीय है। जब साम्राज्यवादी ताकत का आरंभ हुआ 1757 में प्लासी के मैदान में जीत के साथ अंग्रेजों ने अपना शिकंजा कसना शुरू किया। कुछ अंतराल में ही विरोध के स्वर मुखरित हुए इस विरोध को भी पहली बार नारी शक्ति से ही स्वर मिला है। स्वर देने वाले संन्यासी फकीर विप्लव की नायिका थी देवी चौधरानी। यह विप्लव 1763 से 1800 के बीच हुआ। स्वाधीनता के लिए देवी चौधरानी द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पगडंडी बना जिस पर चलकर अनेक महिलाएं स्वाधीनता संघर्ष में भागीदार बनी। स्वाधीनता की हर शाखा को अंगीकृत करके ही महिलाओं ने स्वतंत्रता संघर्ष थामा। जहां इंदौर की वीरांगना भीमाबाई ने खुलकर राज्य के रक्षार्थ 1817 में महिदपुर में युद्ध किया। वहीं कित्तूर (आधुनिक कर्नाटक राज्य का हिस्सा) राज्य की रानी चेन्नम्मा ने 23 अक्टूबर 1824 में अंग्रेजों द्वारा कित्तूर के किले पर किए गए आक्रमण को अपने शौर्य और पराक्रम से नाकाम किया। इसीलिए दक्षिण भारत में कई जगह 23 अक्टूबर को महिला दिवस के रुप में मनाया जाता है। 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पति गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झांसी की सत्ता संभाली। अंग्रेजों को युद्ध में ललकारा रानी का बलिदान भारतीय वीरांगनाओं का उत्कर्ष है। रामगढ़ की रानी अवंती बाई ने शस्त्र उठाकर सतपुड़ा अंचल के आदिवासी इलाकों में कूंच किया और पहली सूरत में समूचे मंडला जिले से अंग्रेजों को निकाल बाहर किया। रानी ने 20 मार्च 1858 को रणक्षेत्र में स्वयं कटार भोंककर प्राण उत्सर्ग किए। बेगम हजरत महल ने लखनऊ में क्रांति का झंडा थामा। बेगम जीतन महल ने दिल्ली की रक्षा के प्रयास के अलावा वृद्ध बहादुर शाह जफर का हौसला बढ़ाया और क्रांतिकारियों का समर्थन किया। तुलसीपुर की रानी ईश्वरी कुमारी अंत तक हथियारों के साथ जंग में डटी रहीं। जालौन की रानी ने क्रांतिकारियों को समर्थन देने के लिए 12 वर्षों की लंबी सजा काटी। महारानी जिंदा ने पंजाब में मोर्चा लिया। इसी महायज्ञ में महारानी तपस्विनी ने संन्यासी विप्लव के द्वितीय चरण का नेतृत्व किया। क्रांति के लिए लाल कमल द्वारा उत्तर भारत में जन जागृति की पृष्ठभूमि तैयार कर क्रांति की लहर प्रचारित की। वीरांगना झलकारी ने झांसी के किले के घिर जाने पर रानी लक्ष्मीबाई का रूप धारण करके मोर्चा संभाला, ताकि रानी सुरक्षित स्थान पर पहुंचे और आगे नेतृत्व कर सके। झलकारी पहचानी गई और तोप से उड़ा दी गई। इसी तरह लक्ष्मीबाई की दोनों सखियां मंदरा और काशी ने भी बलिदान दिया। वीर स्वाधीनता सेनानियों में कानपुर की नर्तकी अजीजन बाई ने वारांगना से वीरांगना बनकर इतिहास रचा। राष्ट्रीय जागरण के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद की असली शेरनी और अरविंद घोष की अग्निशिखा भगिनी निवेदिता ने परतंत्र भारत के जागरण में अनूठा योगदान दिया। वीरांगनाओं की मेधा और बलिदानों को केंद्र में रखकर 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में महिलाओं को मंच प्रदान किया गया। 1890 के कोलकाता अधिवेशन में स्वर्ण कुमारी देवी और श्रीमती कादंबिनी गांगुली शामिल हुईं। श्रीमती गांगुली ने प्रथम महिला मंच नेत्री का गौरव प्राप्त किया। कस्तूरबा गांधी ने 1920-22, 1930 और 1942 में अनेक धरनों, जुलूसों का नेतृत्व किया, अनेक बार जेल गईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता के साथ बा को भी बंदी बनाकर पुणे के आगा खां महल में रखा गया। 1930 के रचनात्मक कार्यक्रम सविनय अवज्ञा आंदोलन नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन में मणिबेन वल्लभ भाई पटेल, सरोजनी नायडू, अरूणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, कमला देवी चट्टोपाध्याय, विजयलक्ष्मी पंडित, मुत्तु लक्ष्मी, एनी बेसेंट, हंसा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर और कमला नेहरू आदि ने इस संग्राम में मंच संभाला। इसी दौरान 1924 में चलने वाले समानांतर क्रांतिकारी आंदोलनों में भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका रही है। क्रांतिकारी महिलाओं में भीकाजी कामा प्रीतीलता वद्देदार, कल्पना दत्त, दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी,लक्ष्मी सहगल आदि क्रांतिकारी भूमिगत कार्यवाहियों और आत्मबलिदान हर मोर्चे पर प्रखर रही। मैडम भीकाजी रुस्तम कामा (1861-1936) 1905 में लंदन पहुंची वहां उन्होंने दादाभाई नैरोजी के साथ कार्य किया। वहीं उनकी मुलाकात श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल, विनायक दामोदर सावरकर से हुई। इंग्लैंड में अंग्रेजों की नाक के नीचे भीकाजी ने अपने भाषणों से अंग्रेजी राज के अत्याचारों का खुलासा किया। वर्तमान भारतीय ध्वज की कल्पना कर सबसे पहले उसे आकार दिया और 1907 में जर्मनी के अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में पहली बार भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया। अन्य क्रांतिकारी महिलाओं में बंगाल की ननी बाला सेन ने 1916 से क्रांति कार्य में सक्रिय योगदान दिया। गिरफ्तारी के बाद बेहद अमानवीय यातनाएं सही इससे पूर्व बंगाल में उन्नीस सौ के दशक के दौरान सरला देवी चौधरी ने अरविंद घोष, जितेंद्र नाथ बनर्जी और विपिन पाल के साथ क्रांति कार्यों का आगाज किया। उन्होंने दल के साथियों को हथियारों का प्रशिक्षण देने के अलावा लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान पर्चे भी बांटे। 18 अप्रैल 1930 को 70 क्रांतिकारियों ने शस्त्रागार पर हमला कर चटगांव शस्त्रागार अभियान का इतिहास रचा। इस अभियान में सुहासिनी गांगुली, सावित्री देवी प्रीतीलता वाद्देदार, कल्पना दत्त शामिल थीं। स्वाधीनता संग्राम की लहर इतनी प्रखर थी कि बंगाल की दो स्कूली छात्राएं शांति घोष और सुनीति चौधरी ने 1930 में कुमिला के जिला मजिस्ट्रेट स्टीवंस की हत्या कर दुनिया को विस्मित किया और आजीवन काले पानी की यातना सही। क्रांतिकारी उज्जवला मजूमदार को 1934 में गवर्नर एंडरसन गोलीकांड के तहत गिरफ्तार किया गया। रंगून से पेशावर और पेशावर से चटगांव तक फैले क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ के प्रखर क्रांतिकारियों में शामिल थी सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी। इस संघ के कमांडर इन चीफ अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में होने वाले अनेक अभियानों में दोनों ने क्रांति कार्य किए। देश को प्रेरित करने और देशभक्ति जन्मने में बौद्धिक मंच का एक बड़ा हिस्सा अगर किसी के पक्ष में जाता है तो वह निश्चित ही ओजस्वी स्वर और तेजस्वी वाणी देने वाली वीर स्वाधीनता सेनानी सुभद्रा कुमारी चौहान को। एक मई 1923 को नागपुर में झंडा सत्याग्रह में गिरफ्तार होने वाली प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी भी वही थीं। सुचेता कृपलानी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय अरूणा आसफ अली राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी। 1944 में पटना में गिरफ्तार होकर वर्ष भर जेल में रहीं। श्रीमती सरोजिनी नायडू 1925 के कानपुर अधिवेशन में अध्यक्ष बनीं। भारत छोड़ो आंदोलन में 72 वर्षीय मातंगिनी हाजरा मिदनापुर में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जत्थे के साथ निकल पड़ी। मातंगिनी हाजरा के जुलूस पर पुलिस लाठी चार्ज हुआ, गोलियां चली मातंगिनी के प्राण निकल गए पर तिरंगा नहीं छूटा। आजाद हिंद फौज में शामिल कमांडर लक्ष्मी स्वामीनाथन, कैप्टन भारती सहाय के योगदान और 14 फरवरी 1946 के नौसेना विप्लव में शहीद राजम्मा, लक्ष्म्मा, श्रीमती काशीबाई, श्रीमती बबाई लक्ष्मण की शहादत का अपना मूल्य है। आगे इसी कड़ी में गोवा मुक्ति आंदोलन की सहोदरा बाई की शहादत अभूतपूर्व है। महिलाओं की सशक्त भूमिका ने कभी शांतिपूर्ण सत्याग्रह, कभी प्रखर क्रांतिकारी,तो कभी संगठनकर्ता के रूप में समय-सीमा लांघकर देश के स्वतंत्रता संघर्ष, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता में अभूतपूर्व योगदान दिया। साम्राज्यवादियों के विरुद्ध महिलाओं की युद्ध और बलिदान का उत्कर्ष देश की आजादी के साथ ही थमा। -रंजना चितले

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