क्या कश्मीरी पंडित अपने घर लौट पाएंगे

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वरिष्ट पत्रकार और कश्मीरी पंडित सिद्धार्थ जराबी का कहना है कि यह सोचना मूर्खतापूर्ण होगा कि जिन कश्मीरी हिन्दुओं ने पूरे भारत और विदेशों में कड़ी मेहनत और दृढ़ता से अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया है, वे घाटी में सरकार की ओर से बनाए जा रहे दडबेनुमा एक कमरे के फ्लेट में रहने जाएंगे।

  • अजय सेतिया

कश्मीर पर बैठक से पहले पाकिस्तान के टीवी चेनलों और अखबारों ने अफवाह उड़ा दी थी कि सरकार 370 वापस लागू करेगी। इस अफवाह को वामपंथियों ने भारत में भी खूब फैलाया था। अफवाह तो एक तरफ, यह सवाल तो उठ ही रहा था कि बैठक का औचित्य क्या था। और उन दो परिवारों को बैठक में क्यों बुलाया गया, जिन्हें अमित शाह ने संसद में ताल ठोक कर कश्मीर के लुटेरे कहा था। इस लिए बैठक की तारीफ कम हुई, सवाल ज्यादा खड़े हुए। बैठक के बाद रात को टीवी चेनलों पर हुई बहस में भाजपा के प्रवक्ताओं को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। इस की बड़ी वजह यह थी कि राजनीतिक दलों की बैठक के नाम पर कश्मीरी पंडितों को बुलाया ही नहीं गया था। ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायसफोरा के अध्यक्ष उत्पल कौल ने ट्विट कर दिया कि वह सारा दिन न्योते का इन्तजार करते रहे।

टीवी चेनलों ने कश्मीरी पंडितों को बुला कर मोदी को कटघरे में खड़ा कर दिया। भाजपा को कहना पड़ा कि मोदी कश्मीरी पंडितों को भी बुला कर बात करेंगे। सच यह है कि 370 और 35ए हटने से कश्मीरी पंडित और देश भर के हिन्दू जितना खुश हुए थे। बाद की घटनाओं से उतना ही दुखी हैं। सरकार ने फिर वही नियम बना दिया है कि कश्मीर में जमीन वही खरीद सकता है, जिस के पास डोमिसाईल होगा। देश के बाकी हिन्दू तो छोडिए, कश्मीरी पंडितों तक को डोमिसाईल बनवाने में पसीने छूट रहे हैं। जिस वेबसाईट को डोमिसाईल के लिए तैयार किया गया है, वह ज्यादातर आवेदनों को ठुकरा रही है। अपने कई जानकार कश्मीरी पंडितों का कहना है कि इस से तो स्टेट सब्जेक्ट ही अच्छा था, उन के पास स्टेट सब्जेक्ट का प्रमाण पत्र तो था।

कश्मीरी पंडितों की समस्याएं जस की तस हैं। उत्पल कौल के मुताबिक़ उनकी पच्चास फीसदी जमीने कौडिय़ों के भाव बिक चुकी हैं, कुछ पर नाजायज कब्जे हो चुके हैं। उन के खुद के साथ हुई एक घटना कश्मीर के हालात को समझने में काफी है, विस्थापन के छह साल बाद1996 में एक टीवी डिबेट में उन्होंने बताया था कि कश्मीर में उन का 14 कमरों का पांच मंजिला घर था। डिबेट खत्म होने के आधे घंटे बाद ही उन का वह पांच मंजिला घर जला दिया गया। वह बताते हैं कि उन की मौसी की 11,500 कनाल जमीन थी, जिस की कीमत 300 से 500 करोड़ रूपए की बीच रही होगी। वह दरबदर हो कर दिल्ली में एक कमरे के मकान में रही। कब्जे की धमकी के बाद उसे सारी जमीन साढे तीन करोड़ में बेचनी पड़ी। जब कश्मीरी पंडितो को घाटी से निकल जाने के लिए मजबूर किया गया तो 14,500 कश्मीरी पंडित सरकारी नौकरियों में थे और इतने ही अर्धसरकारी नौकरियों में थे।

उनको भी घाटी छोड़ कर देश के बाकी हिस्सों में जाना पड़ा था। सिर्फ 850 कश्मीरी पंडित परिवार घाटी में बचे थे, मनमोहन सिंह ने कश्मीरी पंडितों के 2000 बच्चों को सरकारी नौकरी दे कर घाटी वापस भेजा था। मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की योजना को आगे बढाते हुए 2400 अन्य कश्मीरी पंडितों को नौकरी की प्रक्रिया हाल ही में पूरी की है। उन का मानना है कि हालात में कुछ अंतर जरुर आया है, लेकिन इतना भी नहीं कि वे अपने बच्चों को तुरंत वहां लौटने के लिए तैयार कर सकें। मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों को वहां वापस बसाना चाहती है , लेकिन फिलहाल लक्ष्य जम्मू में रह रहे कश्मीरी पंडितों को वापस भेजने का है। जबकि हवेलियों के मालिक रहे कश्मीरी पंडित उन दडबेनुमा मकानों में रहने जाने को तैयार नहीं, जो उन्हें फिर से बसाने के लिए बनाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्री कार्यालय और नीति आयोग में बैठे अफसर ब्यूरोक्रेसी के अलावा बाकी सब भारतवासियों को बीपीएल से ऊपर मानने को तैयार ही नहीं, इसलिए कश्मीरी पंडितों के लिए अपमानजनक फ्लेट बनाए जा रहे हैं।

तो सवाल खड़ा होता है कि 370 और 35 ए हटाए जाने से कश्मीर समस्या का समाधान हो गया है क्या। सब से बड़ी आशा तो यह बंधाई गई थी कि भारत का हर नागरिक वहां जा कर जमीन खरीद सकेगा और कश्मीर को मुस्लिम लैंड बनने से बचाया जा सकेगा। लेकिन जो नए नियम लागू हुए हैं, उन के मुताबिक देश के बाकी हिन्दू या मुसलमान हिमाचल प्रदेश की तरह जम्मू कश्मीर में भी जमीन नहीं खरीद सकते। सिर्फ वही खरीद सकते हैं जो 15 साल से वहां रह रहे हों। यानी ब्यूरोक्रेट्स, बैंक कर्मी और सैनिक आदि। बीटीवीआई चेनल के संपादक रहे दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ जराबी का जब जब मन उदास होता है, वह अपने पैतृक मकान को देखने घाटी चले जाते हैं।

पिछले हफ्ते भी वह घाटी गए थे। लौट कर उन्होंने बताया कि 370 और 35ए हटाने के खिलाफ जितना बवाल मचा था, अब वह शांत हो चुका है, विरोध में अब मुश्किल से 10 प्रतिशत मुस्लिम परिवार ही बचे होंगे, जो पाक समर्थक हैं। नई स्थिति के आत्मसात होते ही पीडीपी की जमीन खिसक चुकी है, शायद पाकिस्तान को दिखाने के लिए बाहर शोर मचाने वाली महबूबा मुफ्ती ने इसी लिए मोदी की मीटिंग में 370 को वापस बहाल करने का मुद्दा नहीं उठाया। घाटी में अब सिर्फ फारूख अब्दुल्ला का नेतृत्व भरोसेमंद है, लेकिन उन का नेतृत्व युवाओं को आकर्षित नहीं करता। कश्मीर में कोई युवा चेहरा नहीं है, जिसे वहां के युवक अपना नेता मान सकें। सिद्धार्थ जराबी कश्मीरी पंडित हैं, लेकिन वह कश्मीरी मुसलमानों की जेहनियत को भी अच्छे से समझते हैं। उन का कहना है कि कश्मीरी लोग मजबूत पारिवारिक और सांस्कृतिक बंधन में रहते हैं, उस अवधारणा के टूटने के खतरे की आशंका होने पर वे हिंसक हो जाते हैं। आतंकवादी उन की इसी भावना का फायदा उठा रहे हैं और ‘बाहरी’ आदि का भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे ममता बेनर्जी ने हाल ही के बंगाल विधानसभा चुनाव में किया था।

सिद्धार्थ की राय उत्पल कौल से जरा अलग है, लेकिन शायद वह ज्यादा जानते हैं क्योंकि एक तो वह ज्यादा जाते रहते हैं, दुसरे क्योंकि वह पत्रकार हैं। सिद्धार्थ का कहना है कि कश्मीरी हिंदुओं के घर वापसी के लिए वस्तुत: कोई घर नहीं बचा है। कई घरों को जला दिया गया, कई को दबाव में कम कीमत पर बेच दिया गया और बाकियों पर कब्जा कर लिया गया है। भावुक हो कर वह कहते हैं कि नाजियों ने यहूदियों और उनकी संपत्ति के साथ ऐसा ही किया था। इस लिए यह सोचना मूर्खतापूर्ण होगा कि जिन कश्मीरी हिन्दुओं ने पूरे भारत और विदेशों में कड़ी मेहनत और दृढ़ता से अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया है, वे घाटी में मोदी सरकार के बनाए दडबेनुमा एक कमरे के घर में रहने जाएंगे। वह कहते हैं कि वह कौडिय़ों के भाव बिके अपने ही घर को अब तीन करोड़ रूपए में कैसे खरीद सकते हैं। (कश्मीर में संपत्ति की दरें मुंबई जितनी अधिक हैं)। और वह सवाल करते हैं कि घाटी में नौकरियां कहां हैं। जानमाल की सुरक्षा की क्या गारंटी है, हिन्दुओं को फिर से मारा जा रहा है।

(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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