Home लेख हुर्रियत कांफ्रेंस पर प्रतिबन्ध लगाये जाने की क्यों पड़ी जरुरत ?

हुर्रियत कांफ्रेंस पर प्रतिबन्ध लगाये जाने की क्यों पड़ी जरुरत ?

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अशोक भाटिया, लेखक स्वतंत्र पत्रकार
vasairoad.yatrisangh@gmail.com

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कश्मीर में अलगाववाद का जिक्र जब जब आता है, आप इसका नाम सुनते हैं। अब चर्चा है कि सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर रोक लगाने की सोच रही है । अगर वाकई ऐसा होता है, तो उसका नतीजा क्या होगा और घाटी में जिस मत का प्रतिनिधित्व करने का दावा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की पार्टियां करती हैं । रिपोर्ट्स के मुताबिक हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों गुटों पर सरकार यानी युएपीए के तहत बैन लगा सकती है । युएपीए की धारा 3 (1 ) में बैन लगाने का प्रावधान है । ये धारा कहती है कि अगर किसी संगठन के बारे में केंद्र सरकार को ये लगा कि ये संगठन गैरकानूनी काम करने लगा है, तो सरकार उस संगठन को गैर कानूनी बताने वाली अधिसूचना जारी कर सकती है । और अब इसी प्रावधान के तहत सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बैन करने वाली फाइल तैयार कर रही है । तो सरकार को अब जाकर क्यों लगा कि हुर्रियत गैरकानूनी काम कर रहा है. इस बैन की दो वजह गिनी जा सकती हैं. पहले तात्कालिक वजह की बात करते हैं.

ताज़ा मामला एमबीबीएस कोटे की सीटें बेचकर पैसे उगाही का है । इस मामले का एक सिरा पाकिस्तान और दूसरा सिरा आतंक से जुड़ा है। पाकिस्तान के मेडिकल और इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट्स में कश्मीरी छात्रों के लिए कुछ सीट रिजर्व्ड होती हैं । स्कॉलरशिप कोटे के तहत कश्मीर के छात्रों की पढ़ाई फ्री होती है । इन सीटों पर दाखिला हुर्रियत नेताओं की सिफारिश से होता आया है । 2014 में जम्मू कश्मीर के अखबार डेली एक्सेलसियर में खबर छपी कि कोटे वाली सीटों पर अलगाववादी नेता गड़बड़ी करते हैं । अलगाववादी नेता या तो अपनी करीबियों का दाखिला करवाते हैं या फिर कश्मीर के छात्रों से पैसा लेकर ये सीटें बेचते हैं । एमबीबीएस की एक सीट का 13 लाख रुपये लेते हैं ।

तब इस खबर पर तब ज्यादा चर्चा नहीं हुई । पिछले साल जब सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की चेयरमैनशिप से इस्तीफा दिया था. तब उसने भी अपने इस्तीफे में हुर्रियत संगठन में वित्तीय गड़बड़ी का जि़क्र किया था, और जांच की बात भी कही थी । गड़बड़ी वाली ये बात सीटें बेचने वाले मामले से जोड़कर देखी गई थी ।जुलाई 2020 में जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज किया । जांच में ये बात आई कि कश्मीर के छात्रों से अलगाववादी जो पैसा लेते हैं उसका इस्तेमाल आतंक बढ़ाने के लिए होता है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े चार लोगों की गिरफ्तारी भी इस मामले में हुई. इनके नाम हैं ।

प्रतिबन्ध लगाये जाने की संभावनाओं के बीच हमें अफगानिस्तान में आये परिवर्तन को भी संज्ञान लेते हुए समग्रता से विचार करना होगा और फिर किसी नतीजे पर पहुंचना होगा। हुर्रियत कांफ्रैंस जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी विशेषकर ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का संगठन रही है जो कश्मीर की समस्या को त्रिपक्षीय बताते रहे हैं । उनका यह तर्क भारत की सरकारों के गले इस वजह से नहीं उतरा है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से कश्मीर की समस्या भारत-पाकिस्तान के बीच का ऐसा मसला रही है, जिसमें पाकिस्तान की हैसियत एक हमलावर देश की रही है।

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