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सिस्टर लूसी के लिए आवाज क्यों नहीं?

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  • सिस्टर लूसी तब चर्चा में आई थी जब जालंधर के रोमन कैथोलिक बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लिया था

सिस्टर लूसी कलप्पुरा वर्ष 2018-19 में पहली बार तब चर्चा में आई थी, जब उन्होंने एक नन से 13 बार बलात्कार करने के आरोपी और पंजाब स्थित जालंधर के रोमन कैथोलिक बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। चर्च के भीतर से महिलाओं की आवाज उठने के बाद दुष्कर्म आरोपी की गिरफ्तारी हुई। इस घटनाक्रम से चर्च और समर्थित संगठनों ने इन ननों और सिस्टरों का बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया।

  • बलबीर पुंज

हाल ही में मैंने केरल निवासी सिस्टर लूसी कलप्पुरा की व्यथा को जाना। उसकी स्थिति देखकर मुझे सन 1412 में जन्मी 19 वर्षीय फ्रांसीसी वीरांगना, जिसे आज ईसाई समाज संत ‘जोन ऑफ आर्क’ के नाम से जानता है- उसका एकाएक स्मरण हुआ। जोन को चर्च द्वारा निर्देशित अभियोजन के बाद जीवित जलाकर मार दिया गया था। तब उसके मुख पर अंतिम शब्द ‘जीसस..जीसस…जीसस’ के थे। आखिर इन दोनों मामलों का आपस में गहरा संबंध कैसे है? इसका उत्तर खोजने हेतु सिस्टर लूसी के साथ हो रहे ‘अन्याय’ को जानना आवश्यक है।

बीते दिनों वेटिकन ने केरल के वायनाड, जहां से कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी लोकसभा सांसद है। वहां स्थित चर्च संगठन ‘फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रेगेशन’ (एफसीसी) से निष्कासित सिस्टर लूसी कलप्पुरा की तीसरी और अंतिम याचिका को भी निरस्त कर दिया। एफसीसी ने अगस्त 2019 में नन लूसी की जीवनशैली पर आपत्ति जैसे अनुमति के बिना ड्राइविंग लाइसेंस रखने, कर्ज लेकर वाहन खरीदने, कविता के प्रकाशन और बिना अनुमति धन व्यय करने का आरोप लगाकर संस्था से निकाल दिया था।

क्या मामला यही तक सीमित है?सिस्टर लूसी कलप्पुरा वर्ष 2018-19 में पहली बार तब चर्चा में आई थी, जब उन्होंने एक नन से 13 बार बलात्कार करने के आरोपी और पंजाब स्थित जालंधर के रोमन कैथोलिक बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। चर्च के भीतर से महिलाओं की आवाज उठने के बाद दुष्कर्म आरोपी की गिरफ्तारी हुई। इस घटनाक्रम से चर्च और समर्थित संगठनों ने इन ननों और सिस्टरों का बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया।


वेटिकन और चर्च के सानिध्य में किसी ईसाई महिला को प्रताडि़त करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इतिहास अपने भीतर कई घिनौने वृतांत को समेटे हुए है, जिसकी जड़ में महिला के प्रति हीन-भावना जनित चिंतन है। जोन ऑफ आर्क की पीड़ा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। सन् 1337 से फ्रांस और इंग्लैंड के बीच युद्ध चल रहा था, जिसे हम ‘शतवर्षीय युद्ध’ के नाम से भी जानते हैं। तब 1412 में उत्तरी फ्रांस के दोमरेमी स्थित एक गांव में किसान के घर जन्मी जोन ने 13 वर्ष की आयु में दावा किया कि उसे ईश्वर ने इस युद्ध में हिस्सा लेने हेतु चुना है।

तत्कालीन फ्रांसीसी राजा चाल्र्स-सप्तम से अनुमति मिलने पर जोन वीरता के साथ लड़ी। एक महिला का पराक्रम फ्रांस और इंग्लैंड के तत्कालीन चर्च समर्थित शासन को रास नहीं आया। 1430 में जब वे छल के बाद पकड़ी गई, तब चर्च अदालत ने जोन पर चुड़ैल (विच) होने, मजहबी मान्यता से विपरीत धारणा रखने (हेरेसी) सहित 70 मामलों को लेकर अभियोजन चलाया और दोष सिद्ध होने के बाद उसे 30 मई 1431 को मौत की सजा दे दी। जोन को उसी तरह सरेआम जीवित जलाकर मारा गया था, जैसे मध्यकाल में ईसाईकरण के समय हजारों-लाखों ईसाई महिलाओं को चुड़ैल घोषित करके मारा जा रहा था। 489 वर्ष पश्चात 1920 में जोन को चर्च द्वारा संत की उपाधि दी गई।

एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार, 1450-1750 के बीच एक लाख महिलाओं को चर्च के निर्देश पर चुड़ैल घोषित करके मार दिया गया था। बात केवल महिलाओं तक सीमित नहीं। 13वीं शताब्दी में दुनियाभर की हजारों बिल्लियों को ‘शैतान’ बताकर मारा गया था। ‘गोवा इनक्विजिशनÓ (1561-1812) के दौरान भी फ्रांसिस जेवियर के नेतृत्व में गोवा में हजारों ईसाइयों और गैर-ईसाइयों को अमानवीय यातना दी गई थी। चर्च का इतिहास ऐसे कई दागों से कलंकित है।

वास्तव में, ईसाई समाज में ‘जोन ऑफ आर्क’ कोई अपवाद नहीं है। यहां लंबे समय से महिला अधिकारों के विरोधी अपने रवैये को न्यायोचित ठहराने के लिए मजहबी कारणों को ढूंढ़ते रहे हैं। यही कारण है कि अधिकतर ईसाई बहुल देशों में महिलाओं को मताधिकार देने में वर्षों का विलंब हुआ। उदाहरण स्वरूप, विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र और ईसाई बहुल अमेरिका में लंबे संघर्ष के बाद महिलाओं को संविधान लिखे जाने (1787) के 133 वर्ष बाद 1920 में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ था। ब्रिटेन का संविधान अलिखित माना जाता है। कुछ अधिनियमों से स्पष्ट होता है कि उनका संविधान 16वीं शताब्दी पूर्व से सक्रिय है। किंतु वहां भी महिलाओं को वोट देने का पहला अधिकार शर्तों के साथ वर्ष 1918-20 में प्राप्त हुआ था। ऐसे कई उदाहरण है।

बीते कई वर्षों से शेष विश्व के साथ भारत में ही विभिन्न कैथोलिक चर्च अधिष्ठान में घृणित अपराधों के कई मामले सामने आ चुके हंै। वर्ष 2017 में केरल के कोट्टियूर स्थित पादरी फादर रॉबिन पर नाबालिग से बलात्कार करने का आरोप लगा था। इस मामले का सबसे बीभत्स पक्ष यह था कि पीडि़ता के पिता ने आरोपी पादरी और चर्च को बदनामी से बचाने हेतु प्रारंभिक जांच में झूठ बोलकर अपनी बेटी से स्वयं बलात्कार करने की बात स्वीकार की थी। किंतु जब उसे इस अपराध के लिए मिलने वाली सजा का भान हुआ, तब जाकर वह सच बोला और फादर रॉबिन द्वारा अपनी बेटी के दुष्कर्म का खुलासा पुलिस के समक्ष किया।

वास्तव में, इस विकृति की जड़ें चर्च की वह ‘गोपनीयता की संस्कृति’ है, जिसमें अनुयायियों को दीक्षित किया जाता है कि कैथोलिक बिशप और आर्कबिशप ‘पवित्र आत्मा’ है, उस पर विश्वास करें, उन्हें पूरा सम्मान दें। यही कारण है कि चर्च के भीतर यौन-शोषण के मामले अक्सर दब जाते है या फिर ऐसी घटना के उजागर होने के बाद सत्य को छिपाना चर्च का प्रथम मजहबी कर्तव्य बना जाता है। यही सब रोमन कैथोलिक बिशप फ्रैंको मुलक्कल से जुड़े बलात्कार के मामले में हो रहा है। प्रारंभ से चर्च और केरल के प्रभावशाली राजनेताओं द्वारा इस मामले को दबाने का भरसक प्रयास हुआ। यहां तक दुष्कर्म पीडि़ता नन को ‘वैश्या’ और आरोपी पादरी को ‘इनोसेंट सोल’ तक बता दिया गया।

बलात्कार आरोपी के खिलाफ मुखर सिस्टर लूसी चर्च के कोपभाजन का शिकार हो रही है। चर्च में बढ़ते यौनाचार के मामलों का कारण कैथोलिक ईसाई समाज की वह रुढि़वादी परंपराओं और प्रथाओं के साथ ब्रह्मचर्य-तत्व जैसे विवादित सिद्धांत भी है, जिससे दैहिक कुंठा का जन्म होता है। ऐसे कुंठित पादरी अनुयायियों (नन सहित) को ही अपना शिकार बनाते हैं। चर्च में पादरियों द्वारा यौनाचर का खुलासा 26 वर्षों तक एक कैथोलिक नन रहीं सिस्टर जेस्मी भी अपनी आत्मकथा- ‘आमीन, द ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए नन’ में किया था।

मध्यकाल में चर्च जिस प्रकार ‘हेरेसी’ के दोषियों के खिलाफ खुलेआम करता था, वह अत्याधुनिक और अब सोशल मीडिया के दौर में संभव नहीं है। सिस्टर लूसी द्वारा बलात्कार के आरोपी बिशप का सार्वजनिक विरोध संभवत: चर्च की परिभाषा में ‘हेरेसी’ ही है, इसलिए उसे वेटिकन के निर्णय के बाद ‘अनुशासनात्मक आधार’ पर वायनाड स्थित कॉन्वेंट छोडऩे को कह दिया गया है। इस मामले पर राहुल गांधी, जो कि वायनाड से कांग्रेस सांसद है- वह भी चुप है। क्या इसका संबंध उनकी ईसाई मातृक पृष्ठभूमि से है?

कितनी बड़ी विडंबना है कि बलात्कार का आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल मामला उजागर होने के दो वर्ष बाद भी सभी सुख-सुविधाओं के साथ चर्च के महत्वपूर्ण पद पर बना हुआ है। वही सिस्टर लूसी चर्च की दृष्टि में अवांछनीय है। सिस्टर लूसी का अपराध यह था कि उसने बलात्कार के आरोपी बिशप को न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत दंडित करने का आह्वान किया, ड्राइविंग लाइसेंस बनाया और एक पुस्तक का प्रकाशन किया।

इस अन्याय के लिए जहां चर्च प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है, वही देश का स्वघोषित प्रगतिशील, उदारवादी और सेकुलरिस्ट कुनबा- जिनका ध्यान एकाएक आसाराम बापू-डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह संबंधित मामलों के अतिरिक्त हाथरस, कठुआ जैसे निंदनीय घटनाओं के साथ ‘मीटू अभियान’ से उपजे मुद्दों पर चला (कैंडल मार्च निकालने सहित) जाता है- उनकी सिस्टर लूसी के लिए खामोशी भी इस अन्याय में बराबर भागीदार है। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम पर प्रख्यात हिंदी कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां- ‘…समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध’ सबसे उपयुक्त है।

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