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सर्वोच्च न्यायालय में ही न्याय प्रक्रिया की अनदेखी क्यों

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  • अनुच्छेद 136 के अंतर्गत दिए गए अपवाद के अधिकार का दुरुपयोग?

सैंकड़ों पृष्ठों के ( कई बार हजार से भी अधिक) फैसले किसके लिए लिखे जाते हैं? 99 प्रतिशत भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पढ़ और समझ नहीं सकते जबकि वे फैसले लागू उन्हीं पर होते हैं। यह कैसा अन्याय है कि जो फैसला किसी ने पढ़ा और समझा ही नहीं वह उसे मानने के लिए बाध्य है।

ओमप्रकाश सुनरया

यह सभी महसूस कर रहे हैं कि कोरोना के बाद दुनिया बहुत बदल जाएगी। देश और पूरे विश्व में महत्वपूर्ण परिवर्तन आएंगे। क्या हमारी न्याय व्यवस्था में भी कोई परिवर्तन आएगा? काश कि सभी को सरलता से न्याय मिल पाता। बिना कुछ खर्च किए, बिना विलंब के। जब निर्भया में तारीख पर तारीखें मिल रही थीं, पूरा देश असहाय महसूस करते हुए अथाह पीड़ा अनुभव कर रहा था, उसी समय हैदराबाद में हुए दुष्कर्म के आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया था।

एनकाउंटर पर न्यायविदों की प्रतिक्रिया चाहे जो रही हो, पर आम जनता ने उसका स्वागत किया था। पुलिस वालों की आरती उतारी गई थी। न्यायपालिका पर व्यंग्य करते हुए अनेक फिल्में बन चुकी हैं। वास्तव में जनता की अपेक्षाओं से, न्यायपालिका बहुत पीछे रह गई है। आइए, निर्भया मामले के माध्यम से हम समस्या को समझने का प्रयास करते हैं।

16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया के साथ अत्यंत बर्बरतापूर्वक निर्भया के साथ बलात्कार किया गया। 11 दिन संघर्ष के बाद निर्भया मृत्यु से हार गई। पुरुष मित्र लंबे संघर्ष के बाद जीवित बच गया। देश और विश्व में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। आपराधिक कानून में परिवर्तन किया गया।

फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सितंबर 2013 को चार आरोपियों को मृत्युदंड दिया। 13 मार्च 2014 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय का समर्थन करते हुए मृत्यु दण्ड की पुष्टि की। 5 मई 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी विचारण न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय का समर्थन करते हुए मृत्युदंड की पुष्टि की। पर उसके बाद भी 19 मार्च 2020 तक कभी दया याचिका, कभी रिव्यू पिटिशन, कभी क्यूरेटिव पिटिशन के कारण आदेश का क्रियान्वयन नहीं हो पाया। निर्भया प्रकरण का विश्लेषण अनेक कोणों से किया जा सकता है। पर विषय केंद्रित रहने के लिए एक बिंदु पर विचार करते हैं।

विचारण न्यायालय में साक्षियों को बुलाना है। उनकी साक्ष्य अंकित करनी है। संपूर्ण प्रकरण का आधार यहीं तैयार होना है, इसलिए अनेक प्रकार की उठापटक भी यहां होती है। फिर भी घटना के नौ माह के भीतर विचारण न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया। 6 माह में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अपना निर्णय सुना दिया। पर सर्वाधिक सुविधाओं वाले सर्वोच्च न्यायालय को अपना फैसला सुनाने में तीन वर्ष से अधिक का समय लग गया। आइए, इसके कारणों का विश्लेषण करते हैं।

5 मई 2017 तक सुप्रीम कोर्ट में इस प्रकरण की 46 पेशियाँ लगीं। इसके बाद 19 मार्च 2020 तक की अनगिनत पेशियों का विश्लेषण हम अभी नहीं करेंगे। इन 46 पेशियों में से, 17 पर कोई भी काम नहीं हुआ,सिर्फ तारीख़ बढ़ी। 8 अप्रैल 2016 को न्यायालय ने स्वप्रेरणा से दो वरिष्ठ अधिवक्ताओं को आरोपियों की मदद के लिए नियुक्त किया। पर इससे आरोपियों के पूर्व से ही नियुक्त अधिवक्ताओं को अपनी छवि की चिंता हुई।

उन्होंने न्यायालय को बतलाया कि इससे लोगों के मन में यह धारणा बनेगी कि आरोपियों ने जिन्हें स्वयं नियुक्त किया है, वे आरोपियों के बचाव ठीक से नहीं कर सकते इसीलिए न्यायालय ने एमिकस क्यूरी की नियुक्ति की है। दिनांक 11 जुलाई 2016 की पेशी आरोपियों के वकीलों के इस संदेह के निवारण में गई। अगली पेशी पर एमिकस क्यूरियों ने अपनी व्यथा व्यक्त की। इसलिए 18 जुलाई 2016 की पेशी उनकी व्यथा के निवारण में गई। अनुवाद दस्तावेजों के निरीक्षण जैसे विविध कार्यों में, जिनके लिए कुछ मिनट ही पर्याप्त थे छह और पेशियाँ गईं। 14 पेशियों पर तर्क सुने गए। 6 पेशियों पर छोटे-बड़े आदेश हुए।

बिल्कुल स्पष्ट है कि आधी से अधिक पेशियों पर लोगों की परेशानी बचाई जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य पूरे देश के 20 हजार से अधिक न्यायालयों के लिए आदर्श प्रस्तुत करना भी है। देश और विश्वव्यापी प्रभाव और प्रचार वाले इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह रिकॉर्ड क्या आदर्श प्रस्तुत कर रहा है?

पर अभी रुकें। इससे कई गुना अधिक महत्वपूर्ण एक अन्य पक्ष पर भी विचार करना आवश्यक है। 13 मार्च 2014 से 20 मार्च 2020 तक के विलंब में से 80 से लेकर 99 प्रतिशत तक के विलंब को सर्वोच्च न्यायालय बचा सकता था। संविधान के अनुच्छेद 134 में आपराधिक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय केअपील के अधिकार को वर्णित किया गया है।

यदि हाईकोर्ट ने दोष मुक्ति के आदेश को उलट कर मृत्युदंड दिया है तो सर्वोच्च न्यायालय में अपील हो सकती है। यदि हाई कोर्ट ने अपने निम्न न्यायालय से मामला वापस लेकर स्वयं विचारण में लेकर मृत्युदंड दिया है तो सर्वोच्च न्यायालय में अपील हो सकती है। यदि हाईकोर्ट यह प्रमाण पत्र देता है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लायक है तो वहां अपील हो सकती है। आपराधिक मामलों में अपील का ही अधिकार सुप्रीम कोर्ट का है।

निर्भया के मामले में इन तीन में से एक भी शर्त पूरी नहीं हो रही थी। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत यह अपील सुप्रीम कोर्ट लाई गई।
अनुच्छेद 136 में सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार दिया गया है कि वह देश के किसी भी न्यायालय के किसी भी प्राधिकरण के किसी भी आदेश के विरुद्ध अपील के लिए विशेष अनुमति दे सकता है। संबंधित प्रावधानों के सरसरे अध्ययन से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इस शक्ति का प्रयोग केवल अत्यंत अपवाद मामलों में ही करना है।

यह व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है कि देश के हजारों न्यायालयों और अनगिनत प्राधिकरणों में हर दिन पारित होने वाले लाखों आदेशों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय अपील सुन सके। इसलिए बिल्कुल प्रारंभ में ही 5 मई 1950 को सर्वोच्च न्यायालय ने ही यह निर्धारित कर दिया था कि केवल अत्यंत अपवाद स्वरूप मामलों में ही अनुच्छेद 136 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की जाएगी। पर इस फैसले का जितना अपमान हुआ है, वह दुखद है।

प्रथम विधि आयोग के अध्यक्ष श्री एम सी सीतलवाड़ ने अपनी 14 वीं रिपोर्ट में अनुच्छेद 136 के दुरुपयोग के संबंध में चेताया था। पर यह दुरुपयोग रुका नहीं है बल्कि निरंतर बढ़ता गया है। 2010 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अनुच्छेद 136 के संबंध में गाइडलाइन बनाने हेतु मामला संविधान बेंच को सौंपा था। संविधान पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के 1950 के दृष्टिकोण की पुष्टि करते हुए उसी के आधार पर प्रकरणों की सुनवाई करने को उचित माना है।

किसी भी दिन की सुप्रीम कोर्ट की कार्य सूची का अवलोकन करें तो प्रकट होगा कि अधिकतर मामले अनुच्छेद 136 के अंतर्गत ही हैं। कभी-कभी तो यह प्रतिशत 80 से 90 तक होता है। मैथ्यू विरुद्ध जॉर्ज के 2010 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के द्वारा जो रिकॉर्ड में ला दिया है वह वस्तुत: सभी न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को पहले से ही ज्ञात था। ऐसी क्या मजबूरी है कि वह अनुच्छेद 136 पर अपने ही निर्देशों का पालन न्यायालय स्वयं ही नहीं कर पा रहा है।

5 मई 1950 के अपने फैसले में उस समय के लगभग पूरे सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वानुमति से यह अभिनिर्धारित किया था कि याचिकाकर्ता को यह स्थापित करना होगा कि उसके मामले में अत्यंत विशेष और अपवाद स्वरूप परिस्थितियां उपस्थित हैं, अत्यंत गंभीर और सारवान अन्याय किया गया है, मामला इतनी गंभीरता का है कि उसका पुनरावलोकन उचित है।

संविधान प्रारंभ होने के समय ही सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 136 के प्रयोग के लिए अनुशासन की लक्ष्मण रेखा निर्धारित कर दी थी। पर जब 2010 में, सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने अनुच्छेद 136 का दुरुपयोग रोकने के लिए मामला पुन: संविधान पीठ को सौंपा तो इस पर संविधान पीठ ने पुन: 5 मई 1950 के निर्णय द्वारा निर्धारित सीमा रेखा का ही अनुमोदन किया।

इसका अर्थ यह हुआ कि 1950 से 2020 तक सतत सर्वोच्च न्यायालय यह मान रहा है कि अनुच्छेद 136 का प्रयोग अत्यंत अपवाद स्वरूप ही होना चाहिए। पर सिद्धांत में बार-बार ऐसा कहने पर भी आचरण में व्यवहार में ठीक इसके उलट क्यों दिखाई पड़ता है? सर्वोच्च न्यायालय की कार्यसूची में हजारों में एक मामला दिखाई पडऩे के स्थान पर, 80 -90 फीसद मामले अनुच्छेद 136 के अंतर्गत क्यों दिखाई पड़ते हैं।

निर्भया के मामले में अपने सैकड़ों पृष्ठों के आदेशों और निर्णय में कहीं भी सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस मामले में अपील की विशेष अनुमति देने की क्या आवश्यकता थी? विचारण न्यायालय के निर्णय को उच्च न्यायालय ने पुष्ट किया था। इस प्रकार के मामले में, सामान्य तौर से सर्वोच्च न्यायालय को अपील का अधिकार नहीं है। इस प्रकार के मामले में केवल विशेष अनुमति देकर ही अपील की सुनवाई हो सकती है।

पर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया के मामले में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है कि विशेष अनुमति क्यों दी गई? सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय द्वारा समर्थित विचारण न्यायालय के निर्णय को सही पाता है-इस एक पंक्ति के निष्कर्ष को लिखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की तीन पीठ के जजों को 429 पृष्ठों में दो फैसले लिखना पड़े। यह क्यों जरूरी था? विशेष अनुमति दिया जाना क्यों जरूरी था?

केवल संबंधित पक्षों का ही नहीं बल्कि यह आम नागरिक का भी अधिकार है कि उसे पता चले कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किस के हित के लिए और क्यों कर रहा है? सर्वोच्च न्यायालय का प्रत्येक जज पद ग्रहण करने के पूर्व यह शपथ लेता है कि वह संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा,भक्ति बनाए रखेगा।

फिर प्रीतम सिंह के मामले में 5 मई 1950 को सुप्रीम कोर्ट ने जो सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं उनका सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही निरंतर उल्लंघन क्यों किया जा रहा है? केवल इन सिद्धांतों का निष्ठा पूर्वक पालन करने से ही सर्वोच्च न्यायालय का लगभग 80 प्रतिशत कार्यभार कम हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की शक्ति का प्रत्येक कण संविधान से आता है।और संविधान की रचना ‘हम भारत के लोगों ने ‘हम भारत के लोगों के हित के लिए, फायदे के लिए की।

फिर यह सैकड़ों पेज के (कई बार हजार से भी अधिक) फैसले किसके लिए लिखे जाते हैं? 99 प्रतिशत भारतीयों सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को पढ़ और समझ नहीं सकते जबकि वे फैसले लागू तो उन पर भी होते हैं। यह कितना बड़ा अन्याय है कि जो फैसला किसी ने पढ़ा और समझा ही नहीं वह उसे मानने के लिए बाध्य है।

दुख की बात यह है कि जो 1 प्रतिशत भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पढ़ और समझ सकते हैं, उनमें से अधिकतर के पास इतना समय नहीं होता कि वह सुप्रीम कोर्ट के लंबे-लंबे फैसलों को पढ़ और समझ सकें। क्या यह सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य नहीं था कि वह सरल, सारगर्भित और छोटे फैसले लिखे ताकि जो भारतीय नागरिक उसके फैसलों को मानने और पालन करने के लिए बाध्य हैं वे उन फैसलों को पढ़ और समझ सकें।

(लेखक पूर्व न्यायाधीश विधिशास्त्र के प्राध्यापक हैं।)

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