देश की सबसे पुरानी पार्टी क्यों गिरती जा रही गर्त में

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  • कांग्रेस का चौतरफा सिकुडऩा दुखद है
  • आर.के. सिन्हा

यह देश के लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटे है कि इतनी पुरानी पार्टी गर्त में मिल रही है। उसमें फिर से जनता के बीच में स्थापित होने का जज्बा खत्म हो चुका है। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस क्यों अपनी कब्र खोद रही है। सच यह है कि उसके नेतृत्व की काहिली के कारण देश एक सशक्त विपक्ष से वंचित है जो लोकतंत्र की मूलभूत आवश्यकता है। निर्विवाद रूप से कांग्रेस का देश के स्वाधीनता आंदोलन में तो शानदार योगदान रहा है। पर इधर हाल के दौर में कांग्रेस का चौतरफा सिकुडऩा दुखद है। उससे देश यह उम्मीद कर रहा था कि यह पार्टी सशक्त विपक्ष के दायित्व को अंजाम देगी। इसके साथ ही देश हित से जुड़े मसलों पर पार्टी सरकार के साथ खड़ी होगी। पर ये इन सभी मोर्चों पर असफल रही। कभी-कभी लगता है कि इसे सत्ता का सुख भोगना ही पसंद आता है। ये सत्ता से बाहर होते ही बिखरने लगती है।

कांग्रेस जन धड़कन से जुड़े मसलों पर न तो सरकार को घेरती है और न ही जनता के साथ सड़कों पर उतरती है। अब तो इसमें आपसी कलह-क्लेश इतना बढ़ गया है कि इसके उबरने की कोई उम्मीद भी शेष नहीं रह गई है। अब पंजाब को ही ले लें। ये देश का कृषि प्रधान राज्य होने के साथ-साथ पाकिस्तान की सीमा से लगा भी है। सरहद के उस पार से पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को फैलाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता। इन परिस्थितियों में राज्य की कांग्रेस शासित सरकार से यह अपेक्षा थी कि वह राज्य को विकास के रास्ते पर ले जाएगी और पाकिस्तान के मंसूबों को कभी सफल नहीं होने देगी। पर वहां तो कांग्रेस के अंदर ही जबरदस्त सिर- फुटौवल मची हुई है।

भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए नवजोत सिंह सिद्धू अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और सरकार पर रोज नए-नए आरोप लगाते रहते हैं। जवाब में अमरिंदर सिंह और उनके कुछ मंत्री भी सिद्धू पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब मीडिया में सिद्धू के आरोपों संबंधी खबरें न छपती हों। राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका की तरफ से इस तरह की कोई ठोस पहल होती नजर भी नहीं आती, ताकि राज्य में कांग्रेस कायदे से कुछ काम कर ले। इनका सिद्धू के साथ कभी प्रत्यक्ष और कभी परोक्ष रूप से खड़ा होना भी अपने आप में सवाल खड़े करता है। उन्हें अमरिंदर की लोकप्रियता अपने लिए भी खतरा नजर आती है। यही बहुत बड़ी कमी होती है किसी नेता की, कि वह अपने से छोटे नेता से डरने लगे। देश को नई तथा पुनरुत्थानवादी कांग्रेस की जरूरत है।

कांग्रेस को साबित करना होगा कि वह सक्रिय है और सार्थक रूप से काम करने की इच्छुक भी है। उसमें व्यापक पैमाने पर सुधार की जरूरत भी है। कांग्रेस के साथ दिक्कत यही है कि यह जनता से जुड़े मसलों पर संवेदनशील रवैया नहीं अपनाती। कांग्रेस को जल्द-से-जल्द संगठनात्मक चुनाव कराने चाहिए ताकि जनता के सामने यह प्रदर्शित किया जा सके कि पार्टी अभी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुई है। पंजाब से पहले सारे देश ने देखा था जब राजस्थान में कांग्रेसी एक-दूसरे से भिड़ रहे थे। वहां पर सचिन पायलट जैसे युवा नेता का कसकर अपमान किया गया। याद रख लें कि आजकल राजस्थान में तूफान से पहले का सन्नाटा है।

सच यह है कि कांग्रेस अपने कर्मों के कारण ही देश की जनता से दूर होती चली गई। वह जिन मसलों को उठाती है, उस पर देश की जनता की अलग राय होती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते दिनों जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ राज्य के राजनीतिक हालातों पर बैठक की। उस बैठक से पहले ही कांग्रेस कहने लगी कि राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा देना जरूरी है। कांग्रेस कहने लगी कि वह (कांग्रेस) मानती है कि संविधान के अनुच्छेद 370 की पुन: बहाली हो।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)

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