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भारत की आजादी अधूरी क्यों?

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भारत की स्वाधीनता 75वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। ऐसे में आत्मचिंतन करना स्वाभाविक हो जाता है कि हम कितने स्वतंत्र है? हमने आजादी से एक दिन पूर्व 14 अगस्त 1947 को देश का एक तिहाई हिस्सा खो दिया था। क्या हम आज उस चिंतन से मुक्त है, जिसने रक्तरंजित विभाजन के बाद पाकिस्तान को जन्म दिया?

  • बलबीर पुंज, वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सदस्य

क्या आज़ाद भारत के साधारणजन को अपनी पसंद के राजनीतिक दल का समर्थन करने, उसके साथ काम करने या किसी विचार से असहमति रखने की स्वतंत्रता है? यदि हम ऐसा सोचते है, तो पिछले सात दशकों से जम्मू-कश्मीर, प.बंगाल, केरल और कुछ हद तक पंजाब आदि क्षेत्रों में हजारों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं या समर्थकों की हत्या क्यों की जा रही है? क्या इसका उत्तर वैचारिक-राजनीतिक घृणा, लोकतंत्र-बहुलतावाद में अविश्वास रखने वाले चिंतन में नहीं छिपा है, जिसे विदेशी वामपंथ विचारधारा और काफिर-कुफ्र की अवधारणा में स्वीकृति प्राप्त है?

क्या यह दोनों दर्शन अपने जन्म से भारत की सनातन संस्कृति और उसके पैरोकारों को मिटाने पर उतारू नहीं है? इन दोनों की जुगलबंदी का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष उदाहरण पाकिस्तान का जन्म है, जिसमें ब्रितानियों के अतिरिक्त इस्लामी कट्टरपंथियों-अलगाववादियों के साथ कार्ल मार्क्स के मानसपुत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भले ही अंग्रेज 74 वर्ष पहले भारत से चले गए, किंतु शेष दोनों दानव- वामचिंतन और जिहादी-मानसिकता स्वतंत्रता के बाद भी न केवल सक्रिय है, अपितु भारत को पुन: कई टुकड़ों में खंडित करने हेतु देशविरोधी शक्तियों (पाकिस्तान-चीन सहित) का हथियार बनकर और स्वघोषित सेकुलरवादियों के समर्थन से शेष-भारत को लीलने का प्रयास कर रही है।

1947 से पहले भारत की स्थिति?

अपने इसी विकृत एजेंडे पूर्ति हेतु इस समूह ने भारत को कभी एक देश नहीं माना। वामपंथी तो आज भी स्वतंत्र खंडित भारत को 17 देशों का समूह मानता है। इस कुनबे के अनुसार, आज हम जिस देश को इंडिया, भारत या हिंदुस्तान नाम से जानते है- उसे एक राष्ट्र के रूप में पहचान अंग्रेजों ने दी। इस तर्क के पीछे वे जम्मू-कश्मीर सहित 565 रियासतों के स्वतंत्र भारत में विलय की दुहाई देते है। साथ ही भारत में लोकतंत्र-पंथनिरपेक्षी मूल्यों की स्थापना के लिए अंग्रेजों की भेंट है। सच कहूं, तो इससे बड़ा झूठ मैंने आजतक नहीं सुना।

विकृत नैरेटिव को ध्वस्त करने का समय

यदि उपरोक्त कुतर्कों को आधार बनाया जाए, तो व्यापारी के भेष में आए अंग्रेजों द्वारा 31 दिसंबर 1600 को स्थापित ईस्ट इंडिया कंपनी में ‘इंडिया’ कहां से आया? लगभग दो हजार वर्ष पुराने विष्णु पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि भारतवर्ष वह देश है, जो समुद्र के उत्तर में और बर्फीले पहाड़ों के दक्षिण में स्थित है।
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतति॥

वायुपुराण में भारत के सटीक आयामों का उल्लेख है, जिसके अनुसार- गंगा के स्रोत से लेकर कन्या कुमारी तक की लंबाई एक हजार योजन (दो हजार मील) है।
योजनानां सहस्रं तु द्वीपोयं दक्षिणोतरम्।
आयतो ही कुमारि क्याद गंगा प्रभवाच्च य:।।

देश के दार्शनिक व्यक्तियों में से एक और भातके दूसरे राष्ट्रपति दिवंगत डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 26 जनवरी 1965 को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में हिंदुस्तान नाम के संदर्भ में हमारे प्राचीन साहित्य के एक श्लोक को उद्धृत किया था:-
हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्।
हिन्दू स्थान मिति ख्यात बन्द यन्ताक्षरयोगत:।।

यह श्लोक स्वत: स्पष्ट और आत्म-व्याख्यात्मक है। यह श्लोक कुलार्णव-तंत्र से लिया गया है, जिसमें विशेष रूप से हिमालय से लेकर “इंदु सरोवर-कन्या कुमारी तक फैली भूमि को हिंदुस्तान कहा गया है।

सांस्कृतिक भारत के पदचिन्ह

प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा के विकास और उसके प्रचार-प्रसार में आदि शंकराचार्य का भी महान योगदान है। उन्होंने भारत के चारों कोनों में- रामेश्वरम स्थित श्रृंगेरी मठ, पुरी में गोवर्धन मठ, द्वारकाधीश में शारदा मठ और बद्रिकाश्रम स्थित ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त भारत में 12 ज्योतिर्लिंग है। बद्रीनाथ धाम में रावल (पुजारी) केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं। मंदिर में पूजा करने का अधिकार केवल इन्हें है। हिमालय की गोद में बसे इस प्राचीन हिंदू तीर्थ में सुदूर दक्षिण के पुजारी को नियुक्त करने की परंपरा शंकराचार्य द्वारा स्थापित है, जो आजतक अबाध रूप से चली आ रही है। चाहे दिल्ली सल्तनत हो या फिर मुगलों का शासन, उसमें भी एक भारत का ही विचार सम्मलित है।

विदेशी यात्रियों के वृतांत में “भारत” का उल्लेख

सदियों के कालखंड में कई विदेशी यात्रियों ने भारत प्रवास किया। क्लाडियस टॉलमी (वर्ष 130), मेगस्थनीज (वर्ष 305), फ़ाह्यान (वर्ष 405-411), ह्वेनसांग (वर्ष 630-45), इत्सिंग (वर्ष 671-95), अलबरूनी (वर्ष 1024-30), मार्कोपोलो (वर्ष 1292-94), इब्नबतूता (1333-47), निकोलो कोंटी (1420-21) आदि विदेशी यात्रियों के संस्मरणों और पुस्तकों में भारत-हिंदू का उल्लेख है।

गुरु नानक देवजी के शब्दों में हिंदुस्तान

यही नहीं, जब 16वीं शताब्दी में क्रूर इस्लामी आक्रांता बाबर भारत आया, जहां उसके निर्देश पर उसकी मजहबी सेना भारत की सनातन बहुलतावादी संस्कृति को जख्मी (अयोध्या स्थित प्राचीन राम मंदिर विध्वंस सहित) कर रहा था, तब उस विभिषका को सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देवजी ने अपने शब्दों में कुछ इस तरह किया –
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तान डराइया।।
आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ।।
एती मार पई करलाणे त्है की दरदु न आइया।।

इस पंक्तियों में गुरु नानकजी केवल पंजाब या फिर सिखों का उल्लेख नहीं किया है, अपितु उन्होंने पूरे हिंदुस्तान की बात की हैं। स्पष्ट है कि बात चाहे मध्यकाल की हो या सदियों वर्ष पुरानी। या फिर राज-शासन किसी का भी रहा हो- सांस्कृतिक भारत अटक से कटक तक और कंधार से केरल तक एक ही था। राज्य भले ही अलग अलग थे, किंतु सांस्कृतिक रूप से भारत एक था।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से लेकर ललितादित्य और चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक आदि का साम्राज्य इसका उदाहरण है, जिनकी व्यवस्था सनातन संस्कृति जनित मूल्यों द्वारा संचालित थी। कालांतर में इस समरसता और बहुलतावाद का विघटन होता चला गया। बारहवीं शताब्दी तक वर्तमान समय का अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर घाटी मुख्य रूप से हिंदू-बौद्ध बहुल थे। सांस्कृतिक भारत के जीवंत अवशेष आज भी श्रीलंका, नेपाल, भूटान, थाईलैंड, इंडोनेशिया और वियतनाम में कुछ मात्रा में पाए जाते है।

राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने हेतु जरूरी क्या?

वास्तव में, किसी भी राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने के लिए दो संसाधनों- संचार और परिवहन की महती भूमिका होती है। क्या इन दोनों के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है? 1830 के दशक टेलीग्राफ संचार प्रणाली विकसित हुई थी। 1814 में भाप का इंजन बना। विश्व की पहली सार्वजनिक परिवहन प्रणाली फ्रांस में 17वीं शताब्दी में, तो स्व-चालित यांत्रिक वाहन 18वीं शताब्दी में प्रारंभ हुई। 1882 में दुनिया की पहली ट्रॉलीबस जर्मनी के बर्लिन में शुरू हुई।

इटली, फ्रांस और जर्मनी का एकीकरण : इन क्रांतिकारी खोजों की पृष्ठभूमि में आज जो लोग सांस्कृतिक राष्ट्र के तौर पर भारत के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाते है- क्या वे जर्मनी, फ्रांस और इटली एकीकरण पर इसी प्रकार का सवाल दागेंगे? 18 जनवरी 1871 को मध्ययूरोप के 39 राज्यों को मिलाकर जर्मनी का एकीकरण हुआ। इसी तरह कई राज्यों में बिखरे इटली का संघीकरण 1860-71 में संपन्न हुआ। 1789 की क्रांति और 1870 में तीसरे गणराज्य की स्थापना से पहले फ्रांस विभिन्न स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र राज्यों में विभाजित था। क्या भारत का एक वर्ग (वामपंथी-जिहादी और स्वयंभू सेकुलरिस्ट) एकीकरण से पहले जर्मनी, फ्रांस और इटली को सांस्कृतिक रूप से एक नहीं मानेगा?

भारत विरोधी चिंतन की गहरी जड़ें

सच तो यह है कि भारत में इस प्रकार का विकृति एकाएक पैदा नहीं हुई। इस चिंतन को मूर्त रूप देने में 2 फरवरी 1835 को लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले द्वारा ब्रितानी संसद में प्रस्तुत “मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैकॉले ने जहां भारत की समृद्ध संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्तकर देश में गुलाम मानसिकता वाली शिक्षा प्रणाली, तो मैक्समूलर द्वारा वेद-पुराण की रूग्ण व्याख्या ने भारतीय समाज को बांटने का बीजारोपण किया। इस चिंतन के अनुरूप अंग्रेजों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों से पढ़कर निकले विद्यार्थियों ने औपनिवेशिक एजेंडे को आगे बढ़ाया।

चर्च के चिंतन की उपज द्रविड़ आंदोलन

वास्तव में, ब्रितानी कुप्रपंच का संभवत: पहला दुष्परिणाम 1947 में इस्लामी पाकिस्तान का जन्म न होकर हिंदू समाज को बांटने वाला जस्टिस पार्टी (1916-17) का उदय था, जो कालांतर में द्रविड़ कडग़म, फिर द्रविड़ आंदोलन में परिवर्तित हुआ। इस कृत्रिम ब्राह्मण विरोधी चिंतन में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों (नग्न चित्रों सहित) का अपमान करने का भाव था। आज भी इस विषैले दर्शन से देश का एक वर्ग जकड़ा
हुआ है।

मैकॉले-मार्क्स विकृत नैरेटिव के संस्थापक

ब्रितानी कुटिलता ने भारत पर क्या प्रभाव डाला, यह साम्यवादी दार्शनिक कार्ल मार्क्स के विचारों से स्पष्ट है। उन्होंने 8 अगस्त 1853 को न्यूयॉर्क ट्रिब्यून में शीर्षक-‘भारत में ब्रिटिश शासन के भावी परिणाम आलेख में लिखा, ‘अंग्रेज पहले विजेता थे, जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी, इसलिए वह हिंदू सभ्यता के लिए दुर्गम थी। उन्होंने देशज समाज को उजाड़कर, स्थानीय उद्योग-धंधों को तबाह करके और मूल समाज के अंदर जो कुछ भी महान और उन्नत था, उन सबको धूल-धूसरित करके भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया। वास्तव में, वामपंथियों का भारतीय संस्कृति, परंपराओं और पर्वों के प्रति घृणास्पद दृष्टिकोण को उनके प्रणेता कार्ल मार्क्स के संकीर्ण चिंतन से प्रेरणा मिलती है। 10 जून 1853 को न्यूयॉर्क ट्रिब्यून में प्रकाशित ‘भारत में ब्रिटिश शासन में मार्क्स ने लिखा, ‘….हमें यह न भूलना चाहिए कि ये काव्यमय ग्रामीण बस्तियां ऊपर से वे चाहे कितनी ही निर्दोष दिखलाई देती हों, पूर्व की निरंकुशशाही का सदा ठोस आधार रही हैं कि मनुष्य के मस्तिष्क को उन्होंने संकुचित से संकुचित सीमाओं में बांधे रखा है जिससे वह अंधविश्वासों का असहाय साधन बन गया है….मनुष्य का अध:पतन इस बात से भी स्पष्ट हो रहा था कि प्रकृति का सर्वसत्ताशाली स्वामी मनुष्य घुटने टेककर वानर हनुमान और गऊ शबला की पूजा करने लगा था।

दिलचस्प बात यह है कि मार्क्स ने भारत की मूल हिंदू संस्कृति और परंपराओं पर यह विचार तब प्रकट किए थे, जब वे कभी भी भारत नहीं आए। इन सभी विचारों को मार्क्स के असंख्य रक्तबीज भारत में 1925 से आज भी आगे बढ़ा रहे है। भारत को इन विदेशी दर्शन से मुक्ति दिलाने हेतु गत वर्ष मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को प्रस्तुत किया। यह स्वतंत्र भारत में 1968 और 1986 के बाद यह तीसरी शिक्षा नीति है। इसमें भारतीय सांस्कृतिक-आध्यात्मिक और भारतीयता पूरिपूर्ण (भाषा सहित) आधारित पाठ्यक्रम को अंगीकार किया गया है। उससे पहले क्या स्थिति थी?

ब्रितानी आगमन से पहले भारत

जब 16-17वीं शताब्दी में ब्रितानी भारत आए, तब यहां के मूलनिवासी हिंदू आबादी का “काफिर-कुफ्र” चिंतन से प्रेरित विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों, उनके द्वारा स्थापित इस्लामी शासन-व्यवस्था और तलवार के बल पर मतांतरित नव-मुस्लिम समाज के साथ लगभग 600 वर्षों का रक्तरंजित इतिहास था। इस दौरान इस्लामी विस्तार हेतु लाखों हिंदू-सिख-बौद्ध-जैन अनुयायियों की हत्या की गई और अंतहीन यातना के बीच उनका मतांतरण किया गया। पराजित हिंदुओं की महिलाओं को या तो विजयी मुस्लिमों के ‘हरम का हिस्सा बना दिया जाता या फिर उनकी बाजारों में नीलामी लगती। विजितों को अपमानित करने हेतु उनके हजारों मंदिरों-पूजास्थलों को जमींदोज करके उसके स्थान पर इस्लामी भवन खड़े कर दिए।

हमें यह अवश्य याद रखना चाहिए कि जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा करना प्रारंभ किया, तब उत्तर-भारत के तत्कालीन पंजाब पर धर्मरक्षक सिखों का साम्राज्य था। राजस्थान में राजपूत और जाटों का वर्चस्व था। ग्वालियर, त्रावणकोर, कोच्चिन आदि तक अनेकों नेक सनातन संस्कृति के ध्वजावाहक- हिंदू शासक स्वयं को इस्लामी शक्तियों से मुक्त कराने में सफलता पा चुके थे। सदियों के शत्रुभाव के बीच हिंदू-मुसलमान में सह-अस्तित्व की भावना उस समय मुखर हुई, जब 1857 की क्रांति के समय अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में राजा-रजवाड़ों, मराठाओं, राजपूतों और नवाबों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। प्रारंभिक सफलता के बाद इस गठजोड़ को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

तब अपने साम्राज्य को भारत में शाश्वत बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने भारतीय समाज की कमजोर कडिय़ों- हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-सिख, सवर्ण-दलित, उत्तर-दक्षिण भारत (आर्य-द्रविड़) और राज-राजवाड़े-प्रजा आदि को ढूंढकर उसपर काम किया। इसके लिए उन्होंने फूट डालो और राज करो की युक्ति अपनाई। उनका राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट था- इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को एकजुट करें, तथ्यों को विकृत करके जाति-पंथ के नाम पर हिंदू समाज को बांटो। यह सब उस समय किया जा रहा था, जब वैश्विक इस्लामी समाज “काफिरों” के दमन के बीच शिया-सुन्नी संघर्षों से ग्रस्त था, तो दुनिया का ईसाई समुदाय का प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक वर्ग आपसी युद्ध से जकड़ा हुआ था। जब अनगिनत ईसाई महिलाओं को चुड़ैल (विच) घोषित करके जीवित जलाया जा रहा था, तो मजहबी मान्यता से विपरीत धारणा रखने (हेरेसी) और ईशनिंदा के आरोपियों को चर्च के निर्देश पर अमानवीय यातनाएं दी जा रही थी।

हिंदू समाज में अस्पृश्यता और परिमार्जन

इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन भारत में मूल हिंदू समाज और इसी भूखंड पर जनित अन्य स्थानीय पंथों- बौद्ध, जैन, सिख अनुयायियों के बीच किसी भी प्रकार का संघर्ष या वैमनस्य वस्तुत: अज्ञात था। दो बातें स्पष्ट थी। पहली- भारतीय समाज सदियों से अस्पृश्यता आदि कुरीतियों से अभिशप्त रही है। इसकी ना ही वैदिक ग्रंथियों में कहीं स्वीकृति है और ना ही संबंधित प्रेरणा है। दूसरी- इन सामाजिक बुराइयों के परिमार्जन के लिए सिख गुरुओं की परंपराओं से लेकर कालांतर में हिंदू समाज के भीतर से प्रबुद्ध व्यक्तियों ने जनचेतना का संचार करते हुए संघर्ष किया है।

स्वतंत्र भारत में दलितों, वंचितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण व्यवस्था का स्वतंत्र भारत में अक्षुण्ण होना और उसे समय-समय पर और अधिक सशक्त करना- हिंदू समाज में आत्मग्लानि भाव के कारण ही संभव हुआ है। वर्तमान समय की बात करें, तो बौद्धिक स्तर पर आज कोई भी हिंदू छुआछूत का समर्थन नहीं करता है।

रामायण और महाभारत में भी “भारत”

श्रीराम वनवास के समय आज के उत्तरप्रदेश स्थित अयोध्या से चलकर लंबी यात्रा के बाद सुदूर दक्षिण के रामेश्वरम पहुंचते है, जहां से वे लंका जाने के लिए रामसेतु का निर्माण करते है। महाभारत में गंधारी वर्तमान अफगानिस्तान में कंधार से थी। जिन राजाओं ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया, वो असम के कामरूप से लेकर सुदूर दक्षिण और पश्चिम तक हिंदू राजा थे। स्वयं भगवान श्री कृष्ण, जो मथुरा में जन्मे, उनका कर्मक्षेत्र हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ रहा। सूदूर पश्चिम स्थित समुद्र किनारे उन्होंने द्वारका बसाई और वही प्राण त्यागे। चाहे महाभारत के युद्ध में भाग लेने वाले राजा विभिन्न राज्यों से थे, किंतु सब मिलकर जिस युद्ध में भाग ले रहे थे- वह विशाल भारत के लिए था।

भारतीय समाज को बांटना चर्च-अंग्रेज का लक्ष्य

देश में दलित बनाम शेष हिंदू समाज और आदिवासी हिंदू नहीं संबंधित भ्रमित-झूठे सिद्धांत की जड़े 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों मं् निहित है। वर्ष 1813 में ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर में अनुच्छेद जोड़कर ब्रितानी पादरियों और ईसाई मिशनरियों द्वारा स्थानीय “हीथन” भारतीयों के मतांतरण का मार्ग प्रशस्त किया था, जिसमें अंग्रेजों द्वारा सभी आवश्यक सहयोग देने का भी प्रावधान था।

तब चर्च ने कालांतर में अंग्रेजों द्वारा स्थापित विकृत तथ्यों को आधार बनाकर दलित, वंचितों और आदिवासी समाज को मतांतरण हेतु लक्षित किया। इसके परिणामस्वरूप, 1857 की क्रांति में भारत का एकमात्र नव-मतांतरित ईसाई समाज पूर्णत: अंग्रेजों के पक्ष खड़ा था। अपनी योजना के अनुरूप, भारतीय समाज में संशय की खाई को और अधिक चौड़ा करने के लिए अंग्रेजों ने वर्ष 1930-32 में दलितों के लिए अलग से निर्वाचक मंडल बनाने की योजना बनाई, जिसे गांधीजी और डॉ.अंबेडकर के पूना पैक्ट ने विफल कर दिया।

विकृत आर्य-आदिवासी-दलित सिद्धांत

अंग्रेजों ने भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को विकृत करने हेतु झूठा सिद्धांत स्थापित किया- “जातिगत हिंदू आर्य आक्रमणकारी थे, जिन्होंने यहां के मूलनिवासियों (आदिवासी-दलित सहित) को अपने अधीन कर लिया और ब्राह्मणों द्वारा लिखे हिंदू ग्रंथों में इसे न्यायोचित ठहराया गया है। हिंदू समाज को बांटने, उन्हें मतांतरण हेतु प्रोत्साहित करने और ब्राह्मणों का दानवीकरण हेतु यह दुष्ट-त्रुटिपूर्ण नैरेटिव तैयार किया गया था। वेदों और महाभारत का संग्रह करने वाले कृष्णद्वैपायन वेद-व्यास ब्राह्मण ना होकर एक मछुआरे के पुत्र थे।

श्रीमद्वाल्मिकीय रामायाण के रचिता मुनि वाल्मिकी, जो अनादिकाल से आदिकवि के रूप प्रतिष्ठित है- आज उनके नाम पर समुदाय को दलित के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यहां तक, मनुस्मृति के रचयिता मनु भी ब्राह्मण नहीं थे। सच तो यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर लोगों के पूर्वज कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि युगों-युगों से इसी धरती की संतान रहे हैं, जिनकी जड़े सनातन संस्कृति में निहित है। वास्तव में, हिंदू समुदाय भिन्न-भिन्न उप-वर्गों का वृहद समाज है, जो अपनी विशेष परांपराओं, सिद्धांत, पूजा-पद्धति, रीति-रिवाजों, परंपरा, परिधानों आदि से अलंकृत है। इन सभी का मूल आधार सनातन हिंदू परंपरा है- जो नित नूतन, चिर पुरातन है।

खालिस्तान नैरेटिव के रचनाकार अंग्रेज

ब्रितानी कुटिलता का प्रत्यक्ष प्रभाव 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में पहली बार तब दिखा, जब सिख पंथ हिंदू समुदाय से बाहर जाने वाला पहला बड़ा समुदाय बना गया। इससे पहले पंजाब का हर हिंदू स्वयं को सिख और प्रत्येक सिख खुद को हिंदुओं का रक्षक मानता था। इस सौहार्दपूर्ण संबंध की आधारशिला सिख गुरुओं ने स्थापित की थी, जो सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल तक अक्षुण्ण रही। इसी बंधुत्व को ब्रितानियों ने तोडऩे हेतु मैक्स आर्थर मैकॉलीफ को पंजाब भेजा। उनके विषाक्त साहित्यों ने स्वतंत्र भारत मं खालिस्तान आंदोलन की नींव रखी। सिख समाज का एक वर्ग आज भी अपने गुरुओं द्वारा स्थापित मार्गों पर चलने के बजाय अंग्रेजों के बनाए भ्रम में फंसा हुआ है।

समाजवाद ने घोंटा भारतीय आर्थिकी का गला

जिनकी आयु आज 45 वर्ष या उससे कम है, वह शायद ही 1970-80 के दौर की भयावहता को जानते होंगे। समाजवादी नीतियों और चिंतन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो गई थी कि व्यक्ति को कार खरीदने के लिए सात साल, तो स्कूटर के लिए नौ साल प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। चीनी, दूध जैसे दैनिक खाद्य-वस्तुओं के साथ-साथ सीमेंट, टेलीफोन आदि के लिए पंक्तियों में लगना पड़ता था और सार्वजनिक रूप से कालाबाजारी होती थी। उस समय सरकारी स्वामित्व वाली एचएमटी के पास घड़ी उत्पादन का एकाधिकार था। तब घडिय़ां मिलना इतना कठिन था कि यह भारतीय सामाजिक बुराई- दहेज में मान-सम्मान का प्रतीक बन गया था।

वर्तमान करदाता जानते भी नहीं होंगे कि उस कालखंड में सरकार ने जनता पर 97.7 प्रतिशत का आयकर थोपा हुआ था, जिसपर 3.5 प्रतिशत का संपत्ति कर अलग से लिया जाता था। स्थिति यह थी कि यदि कोई अति-धनवान व्यक्ति अपनी सारी संपत्ति राष्ट्रीय बचत योजना पर सात प्रतिशत के ब्याज पर लगा दें, तो कर चुकाने के बाद उसके पास 25 हजार रूपये भी नहीं बचते थे। इस वामपंथ प्रेरित व्यवस्था ने तब देश में कालेधन, कॉरपोरेट शुचिता, भ्रष्टाचार, गरीबी और कपट को बढ़ा दिया। 1980 आते-आते स्थिति ऐसी बिगड़ी कि अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए हमें अपना स्वर्ण भंडार तक विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा।

वाम-समाजवाद की जकड़ में स्वतंत्र भारत

कांग्रेस विघटन के बाद 1969 में जब अपनी सरकार बचाने हेतु तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वामपंथियों का समर्थन लिया और उनकी बौद्धिकता को अंगीकर करते हुए अपनी मूल सनतान विचार को तिलांजलि दे दी, तब बैंकों से लेकर कोयला, इस्पात, तांबा, सूती-वस्त्र, बीमा उद्योग और कई प्रकार खाद्य-पदार्थों तक का राष्ट्रीकरण कर दिया गया। देश लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से जकड़ गया। समाजवादी नीतियों के अंधाधुंध अनुकरण से भारतीय उद्यमी और ऊर्जावान प्रतिभा कुंठित होते चले गए। इस दौरान भारत चार बड़े हमले झेल चुका था, जिसमें 1962 को उसे चीन के हाथों शर्मसार होना पड़ा।

वामपंथियों ने फोड़ा हिंदुओं पर ठीकरा

तब मार्क्सवादियों ने समाजवाद की भयंकर असफलता का ठीकरा अपने चिंतन के अनुरूप, देश की सनातन संस्कृति और हिंदुओं पर फोड़ दिया। उस समय वामपंथी अर्थशास्त्री प्रोफेसर राजकृष्ण ने देश के निम्न विकास के लिए ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ को जिम्मेदार ठहरा दिया। इसके माध्यम से तब यह स्थापित करने का प्रयास हुआ कि देश में हिंदू समाज की सनातन मान्यताओं और उनकी आबादी के कारण भारत आर्थिक तंगी और गरीबी से अभिशप्त है।

इस पर मैंने तब एक आलेख के माध्यम से प्रो.राजकृष्ण से पूछा था, यदि भारत में गरीबी और उसके निम्न विकास दर के लिए हिंदुओं की आबादी जिम्मेदार है, तो क्या वह बांग्लादेश की बदहाल अर्थव्यवस्था के लिए मुस्लिम या इस्लाम को उत्तरदायी ठहराएंगे?- जैसा कि प्रो. राजकृष्ण जैसे विशुद्ध वामपंथी से अक्सर अपेक्षा रहती है, उन्होंने या उनके किसी मानसबंधु ने मेरे प्रश्न का आजतक उत्तर नहीं दिया। सच तो यह है कि सदियों पहले भारत- तत्कालीन संसाधनों, शत-प्रतिशत हिंदू श्रमशक्ति और वैदिक केंद्रित ज्ञान के बल पर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपना एकाधिकार रखता था। प्रख्यात ब्रितानी आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन और बेल्जियम अर्थशास्त्री पॉल बरॉच का वस्तुपरक शोध- इसका प्रमाण है।

स्वतंत्रता के बाद स्थिति नहीं बदली

15 अगस्त 1947 के बाद भारत में उपरोक्त सभी नीतियां, विचार और व्यवस्था को बदलना चाहिए था। किंतु ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजों के जाने के बाद उनके खाली पदों पर मैकॉले-मार्क्स मानसपुत्रों ने स्थान ग्रहण कर लिया। विदेशी चिंतन से प्रभावित होकर स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक भारतीय नेतृत्व ने जहां वामपंथ प्रेरित समाजवाद को अपनाया, वही हिंदू समाज को जाति के नाम पर बांटना, सनातन परंपराओं से घृणा करना, चर्च-ईसाई मिशनरियों द्वारा मतांतरण अभियान का प्रत्यक्ष-परोक्ष वित्तपोषण और मुस्लिमों को इस्लामी पताका के तले एकजुट रखना जारी रखा।

भारत का आर्थिक-सामरिक-वैज्ञानिक डंका

जब सोवियत संघ का विघटन (1988-1991) हुआ और 1991 में भारत में आर्थिक सुधार प्रारंभ हुए, तब कालांतर में नीतिगत रस्सियों से बंधे प्रतिभाशाली लोगों के हाथ खुलने शुरू हुए। उन्होंने देश की आर्थिक तस्वीर बदली और कालांतर में हमारा देश खाद्य-वस्तुओं और सेवा आदि क्षेत्रों में दुनिया का सरताज बन गया। देश में तीव्रता के साथ गरीबी घट रही है। 2019 के एक आंकड़े के अनुसार, 14-15 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे है।

अब भारत की विशाल जनसंख्या होने के कारण यह अनुमानित आंकड़ा लगभग 20 करोड़ हो जाता है, जो विश्व में कई देशों की कुल आबादी से अधिक है। यही नहीं, वर्तमान कोरोनाकाल में यदि जिन चुनिंदा देशों ने प्रभावी वैक्सीन बनाई है, उसमें से भारत भी एक है। चीन की गीदढ़भभकी पर वर्तमान भारत उचित प्रतिक्रिया दे रहा है। अपने चिरपरिचित शत्रुराष्ट्र पाकिस्तान को भारतीय कूटनीति ने दुनिया में अलग-थलग कर दिया है। गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को अस्थायी सदस्यता हेतु 193 में से 184 देशों का समर्थन प्राप्त हुआ था।

क्या भारत “सेकुलर” संविधान के कारण है?

अक्सर, यह सवाल उठता है कि भारत इतनी विविधताओं, जिसमें भाषा, खानपान, रहन-सहन, वेश-भूषा के साथ-साथ परंपराओं में भी भिन्नता दिखती है- वहां लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद अक्षुण्ण कैसे है? मैकॉले-मार्क्स मानसबंधु इन मूल्यों को अंग्रेजों का उपहार बताते है। क्या भारतीय संविधान, उसमें निहित नागरिक अधिकारों-प्रावधानों या 1976 में संविधान की प्रस्तावना में संशोधन के बाद जोड़ा गया विदेशी शब्द “सेकुलर” के कारण भारत- लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और पंथनिरपेक्ष है? यदि ऐसा ही है, तो संविधान संरक्षक सर्वोच्च अदालत, विधायिका और मीडिया के होते हुए वर्ष 1989-91 में पांच लाख कश्मीरी पंडित घाटी से जिहादी दंश झेलने के बाद पलायन के लिए विवश क्यों हुए?

देश का हिंदू-चरित्र बहुलतावाद की गारंटी

वास्तव में, कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं का सांस्कृतिक नरसंहार इसलिए हुआ, क्योंकि वहां का “इको-सिस्टम” मजहबी कारणों से लोकतंत्र, बहुलतावाद और पंथनिरपेक्षता को स्वीकार नहीं करता है। 1947 से पहले भारत का हिस्सा रहे पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज हिंदू सहित अन्य गैर-मुस्लिमों का उत्पीडऩ, उनकी निरंतर घटती जनसंख्या और मंदिरों का हालिया विध्वंस इसी विषाक्त इको-सिस्टम के कारण ही है। दुर्भाग्य है कि इस “इको-सिस्टम” को स्वतंत्र भारत में सेकुलरवाद की आड़ में मदरसा शिक्षा प्रणाली के माध्यम से आज भी पोषित किया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल मदरसों की संख्या 24 हजार है। सच तो यह है कि खंडित भारत का हिंदू चरित्र ही देश में लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद की सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है, जिसे वामपंथी-जिहादी कुनबा लगातार चुनौती दे रहा है।

भारत में अपार संभावनाए

यह बात ठीक है कि हम और हर संदर्भ में और अच्छा कर सकते थे। कई क्षेत्रों में आज भी आधारभूत मूलभूत सुविधा- जैसे शिक्षा, बिजली, पीने का स्वच्छ पानी आदि आभाव है। फिर भी यदि एक औसत भारतीय से पूछा जाए कि क्या वह पड़ोस के किसी देश- पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका या चीन में बसना चाहेगा तो अधिकांश का उत्तर ना ही होगा। यह हमारी स्वाधीनता की बड़ी उपलब्धि है, जिसे हमने आजतक अक्षुण्ण रखा है। विश्व के इस भाग में हम एक जीवंत लोकतंत्र है।

तमाम कठिनाइयों के बावजूद हमारी बहुलतावादी व्यवस्था कायम है। हर प्रकार के षडय़ंत्रों को विफल करते हुए और विघटनकारी शक्तियों से लोहा लेते हुए हम एक सशक्त राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने है। गांधीजी, श्रीकृष्ण और भगवान बुद्ध के माध्यम से आज हम आध्यात्म के क्षेत्र में विश्व में अपनी छाप छोड़ रहे है। जहां हम कंप्यूटर विद्या के विशेषज्ञ होने के नाते वैश्विक वैज्ञानिकता में अपनी पहचान बनाए हुए है, वही दूसरी ओर योग और आयुर्वेद के बल पर स्वस्थ मानवजीवन के प्रतीक को स्थापित किए हुए है। मेरा अडिग विश्वास है कि भारत में ढेरों नई बुलंदियों को छूने की अपार संभावनाएं है। इसी आशा के साथ सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद।

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