Home लेख आत्मशांति के लिए संतुलन इतना जरूरी क्यों ?

आत्मशांति के लिए संतुलन इतना जरूरी क्यों ?

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  • अपनी मानसिकता व कर्मो के बीच संतुलन चाहिए। इसी से आप ऊंचाई को छू सकते हैं।
  • नागेश्वर सोनकेशरी

शांति का अहसास प्राप्त करने के लिए हमें संतुलन की बहुत जरूरत होती है । पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन, कर्म और धैर्य के बीच, ऑफिस और घर के बीच, दिनचर्या और आदतों के बीच, परिवार और मित्रों के बीच,मौज मस्ती व संयम के बीच, मेहनत व आराम के बीच, कमाने और बचाने के बीच, हँसी और गंभीरता के बीच, छोडऩे व पकड़े रहने के बीच और तो और शादी के बाद पत्नी व मॉं के बीच संतुलित रहना होता है। जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने में नाकाम होना आपको परेशान कर सकता है व एक संतुलित रवैया अपनाकर आप सहज महसूस करते हैं ।

कई बार तो सहज होने की स्थिति को हमारे परिचित गलत समझने लगते हैं व यदि हम थोड़ा खुद के बारे में सोच रहे हों तो तत्काल स्वार्थी का ठप्पा लग जाता है। जबकि खुद से प्यार करना हमें परिस्थितियों से तालमेल बनाना सिखाता है। इस तालमेल से व्यक्ति संतुलन के साथ-साथ खुशहाल जीवन जीना शुरू कर देता है। आपका जीवन सुधार की दिशा में आगे बढ़ता चला जाता है। इससे उस समय भले ही आप साधारण परिस्थितियों में हों परन्तु आप और अधिक बेहतर पाने के योग्य होते चले जाते हैं और योग्यता की यह सामर्थ्य बढ़ती जाती है। इसी तरह आप उस स्थिति में आ जाते हैं जहॉं से जीवन में दूसरों के लिए भी कुछ करने की या हरसंभव सहायता करने की स्थिति बन जाती है।

कई बार तरक्की की राह में आकर हमारा संतुलन बिगडऩे लगता है व हमसे कई गलतियॉं होने लगती हैं। इन गलतियों से पतन की शुरुआत हो जाती है। जिससे हम बार-बार लडख़ड़ाते हैं, गिरते हैं व दिशाहीन महसूस करतें हैं। कई बार हम संभल जातें हैं व कई बार नहीं भी। खुद की मानसिकता व कर्मों के बीच संतुलन बनाकर आप बहुत उँचाई तक पहुँच सकते हैं वो भी एक मुस्कुराहट के साथ। इससे आपका जीवन दूसरों के लिए एक मिशाल बन सकता है और आपके अपनों के लिए गर्व का भाव भी पैदा कर सकता है।

मेरे जीवन की शुरुआत बहुत साधारण तरीके से हुई और गुरूकृपा से जीवन का सही संतुलन आज विपरीत परिस्थितियों में भी आनंद दे रहा है। मेरी पढ़ाई बहुत ही छोटे जिले में साधारण से शासकीय स्कूलों में हुई। जब जीवन की समझ थोड़ी बढ़ी तभी से मैें हमेशा अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने व अपने परिवार को गौरवान्वित करने के लिए निरंतर प्रयास करता रहा हूँ। मैंने अपने शासकीय कार्य, सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों एवं खुद के व्यक्तिगत जीवन जिसमें मेरा पूजन-पाठ, लिखने-पढऩे, घूमने-फिरने के शौक से लेकर, धार्मिक यात्राओं आदि सभी कुछ इसी संतुलन की आदत की वजह से, बिना किसी भी अन्य उत्तरदायित्व में कमी करे, आसानी से पूरा कर पाया हूँ।

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