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भारत को इसलिए करनी चाहिए टीटीपी की मदद

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टीटीपी अब सिर्फ पख्तूनख्वा की बात नहीं करती। नूर वली ने अपने हाल ही के वीडियो में ‘आजाद बलूचिस्तान, ‘आजाद पश्तूनिस्तान और ‘सिंधु देश की मांग रखते हुए कहा है कि पाकिस्तानी सेना इन ‘राष्ट्रों के नागरिकों पर वैसे ही अत्याचार कर रही है, जैसे बंगालियों पर किए थे और बांग्लादेश बना। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश की तरह टीटीपी इन राष्ट्रों की जमीनों को सेना से मुक्त कराएगी। आजादी के बाद से पाकिस्तान भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है 7 तो क्या भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से यह सही नहीं होगा कि वह पाकिस्तान के चार टुकड़े करने की मंशा रखने वाले दृष्टिकोण का समर्थन करे।


अजय सेतिया
इंडिया गेट टीवी यूट्यूब और इंडिया गेट न्यूज डाट काम के सम्पादक हैं

जब से अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हुआ है, पाकिस्तान की अपनी तालिबान ‘तहरीक-ए-तालिबानÓ यानी (टीटीपी) की खूब चर्चा हो रही है। टीटीपी कोई बहुत पुराना संगठन नहीं है, इसलिए ज्यादातर भारतीय उसके बारे में नहीं जानते। जैसे बलूचिस्तान को पाकिस्तान से आजाद करवाने के लिए बलूची पिछले 72 साल से पाकिस्तानी सेना से लड़ मर रहे हैं। वैसे ही नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस यानी एन.डब्ल्यू.एफ.पी के पश्तूनी भी अलग पश्तूनिस्तान के लिए लड़ रहे हैं। अफगान तालिबान और अल-कायदा से ताल्लुक रखने वाले खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र और महसूद जनजाति के एक प्रमुख उग्रवादी नेता बैतुल्ला महसूद ने 2007 में पश्तूनिस्तान के लिए लड़ रहे छोटे छोटे संगठनों को एकजुट कर के टीटीपी का गठन किया था।

इस समय टीटीपी पाकिस्तान के इतिहास में सबसे ताकतवर संगठनों में से एक है, जिसने पाकिस्तान की नाक में दम किया हुआ है। यह वह समय था, जब अमेरिका अफगानिस्तान में आ चुका था और वह पाकिस्तान से मिलकर तालिबान की सरकार गिराकर अल कायदा के नेताओं को ढूंढ रहा था। 2009 में टीटीपी के संस्थापक बैतुल्ला महसूद अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया। उसकी जगह पर हकीमुल्लाह महसूद को टीटीपी का आमिर यानी नेता चुना गया। अमेरिका ने 2013 में टीटीपी के आमिर हकीमुल्लाह महसूद को भी ड्रोन हमले में मार दिया।


इसके बाद पहली बार एक गैर महसूद मुल्ला फज-लुल्लाह को टीटीपी चेयरमेन यानी आमिर घोषित किया गया। नतीजतन टीटीपी में महसूद, गैर-महसूद, गैर-आदिवासी कैडरों में शुरू गुटबाजी हो गई। इस गुटबाजी का फायदा उठाकर पाकिस्तानी सेना ने अमेरिकी मदद से जून 2014 में टीटीपी का सफाया करने के लिए ‘जर्ब-ए-अज्ब’ नाम से आपरेशन शुरू किया। नतीजतन टीटीपी कमजोर हो गया और कई बड़े और मझौले नेता अफगानिस्तान भाग गए। इसी आपरेशन में 2018 में अपने पूर्ववर्तियों की तरह मुल्ला फज-लुल्लाह भी ड्रोन हमले में मारा गया। तब तक टीटीपी करीब करीब खत्म हो गई थी। गैर-महसूद का प्रयोग विफल रहने के बाद चार साल के बाद 2018 में नूर वली महसूद को टीटीपी का नया आमिर घोषित किया गया।

नूर वली महसूद एक पढ़े-लिखे इंसान हैं और पश्तूनों में उनकी गिनती बुद्धिजीवियों में होती है। उनकी कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। टीटीपी के संस्थापक बैतुल्लाह महसूद और उसके बाद के अन्य महसूद नेताओं ने हमेशा अल कायदा के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे थे, जिस कारण अल कायदा टीटीपी को आर्थिक मदद करता रहा था। हक्कानी नेटवर्क टीटीपी का एक अन्य वित्तीय स्रोत है। वसूली भी टीटीपी का वित्तीय स्रोत था जिस कारण टीटीपी की साख और छवि खत्म हो चुकी थी। अब उसने पिछले तीन साल से आम लोगों या प्राइवेट संस्थाओं से किसी तरह की कोई वसूली नहीं करने और उनकी हत्याएं भी नहीं करने की रणनीति अपनाई है। अब टीटीपी सिर्फ पाकिस्तानी सरकार की परियोजनाओं के ठेकेदारों से ही लागत का 5 प्रतिशत वसूल करती है।

अल कायदा की सलाह से नूर वली महसूद ने दो-तीन और बड़े काम किए, पहला काम यह कि टीटीपी का मुख्यालय पूर्वी अफगानिस्तान से उठाकर दक्षिण पूर्व में ले गए जो पाकिस्तान की वजीरिस्तान सीमा के करीब है। इससे टीटीपी फिर से पुनर्गठित और मजबूत होना शुरू हुआ, पाकिस्तान में सक्रिय अनेक आतंकी संगठनों ने टीटीपी के साथ हाथ मिला लिया है। अमजद फारूकी और लश्कर-ए-झांगवी गुट ने टीटीपी में विलय की घोषणा की। इस साल अगस्त के शुरू में उस्ताद असलम के संगठन सहित कई और संगठन भी टीटीपी में शामिल हो गए हैं। इससे पाकिस्तान के सीमान्त क्षेत्रों में टीटीपी की गतिविधियाँ तेज हो गई।

दूसरा काम उन्होंने यह किया कि पाकिस्तान सरकार को पलटने के लक्ष्य की बजाए पश्तून आबादी वाले क्षेत्र को पाकिस्तान से मुक्त करवाने का लक्ष्य निर्धारित किया। टीटीपी का अफगानिस्तान के तालिबान से संबंध बढाया , जिसके नतीजे तालिबान सरकार गठन से पहले ही मिलने शुरू हो गए थे। तालिबान ने अफगानिस्तान की विभिन्न जेलों, खासकर बगराम जेल और पुल-ए-चरखी जेल में कैद टीटीपी के 2300 आतंकियों को रिहा कर दिया। सभी पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की ‘मोस्ट वांटेड सूची में शामिल हैं ।

तालिबान ने टीटीपी के नेताओं को रिहा ही नहीं किया बल्कि साफ कहा है कि पाकिस्तान टीटीपी नेताओं के साथ बातचीत करके अंदरुनी समस्या का समाधान करे। पाकिस्तान के घोषित आतंकवादियों को तालिबान की ओर से रिहा किए जाने पर पाकिस्तान भयभीत है। उसे डर है कि टीटीपी के आतंकी सीमा पर इंतजार कर रहे शरणार्थियों के साथ घुसपैठ कर पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधिया तेज करेंगे।

तालिबान सरकार चीन, पाक के दबाव में

अब बड़ा सवाल यह है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार बनने के बाद भी क्या तालिबान और हक्कानी नेटवर्क टीटीपी को वैसा ही समर्थन और सहयोग जारी रखेगा। यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि पाकिस्तान उस का सबसे बड़ा सहयोगी देश है। लेकिन टीटीपी को लगता है कि तालिबान सरकार और हक्कानी नेटवर्क उन्हें पहले की तरह ही सहयोग करते रहेंगे क्योंकि तालिबान और टीटीपी की विचारधारा एक समान ही है ।

टीटीपी भी शरिया आधारित शासन चाहती हैं, और तालिबान भी। तालिबान शासन टीटीपी को और अधिक प्रचार करने में सक्षम बनाएगा, जिससे अधिक लड़ाकों की भर्ती होगी और सभी क्षेत्रों से अधिक वित्तीय सहायता प्राप्त होगी । लेकिन टीटीपी की यह खामख्याली है क्योंकि टीटीपी पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए सिरदर्द बना हुआ है और दोनों ही देश अंतर्राष्ट्रीय गुटबाजी और कूटनीति के कारण तालिबान के ज्यादा करीब आ रहे हैं।

जहां तक चीन का सवाल है, तो टीटीपी न सिर्फ चीन के उईगर मुसलमानों का समर्थन करती है, बल्कि पाकिस्तान में बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुडी योजनाओं पर भी बलूचिस्तानियों से मिलकर आतंकी वारदातें कर रही है। टीटीपी और बलूच विद्रोही संगठनों ने अभी 14 जुलाई को ही मिलकर नौ चीनी श्रमिकों पर आत्मघाती हमले को अंजाम दिया था ।


चीन-पाक-तालिबान का निशाना कश्मीर

चीन और पाकिस्तान ने मिलीजुली रणनीति के तहत तालिबान से सम्पर्क बढाया है। इसी रणनीति के तहत आई.एस.आई चीफ हमीद काबुल गए और पंजशीर पर कब्जा करने के लिए तालिबान को सैन्य मदद दी, जिसके खिलाफ अफगानिस्तान में लोग सड़कों पर भी उतरे। इसलिए यह साफ है कि अगर अफगानिस्तान चीन-पाक के आर्थिक गलियारे में खुद ही भागीदार बन जाता है तो तालिबान टीटीपी पर चीन और पाकिस्तान के खिलाफ काम करने पर बंदिश लगाएगा।

आशंका यह है कि चीन और पाकिस्तान की रणनीति तालिबान से दबाव डलवा टीटीपी को कश्मीर के मोर्चे पर सक्रिय करना है। पाकिस्तान में स्थानीय समाचार एजेंसियों का तो यहाँ तक मानना है कि तालिबान की मध्यस्थता से टीटीपी और इमरान खान सरकार के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है । अब भी टीटीपी स्पष्ट रूप से खैबर पख्तूनख्वा में आदिवासी क्षेत्रों पर नियंत्रण और शरिया कानून लागू करने की मांग अड़ी है। बड़ा सवाल यह कि टीटीपी तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, चीन और पाकिस्तान के दबाव में आती है या नहीं । अगर वह इस्लाम के नाम पर दबाव में आती है तो कश्मीर में समस्या बढ़ सकती है क्योंकि जम्मू कश्मीर खैबर पख्तूनख्वा से ज्यादा दूर नहीं ।


इस्लाम के नाम पर बना राष्ट्र विफल रहा


लेकिन दूसरी टीटीपी का यह भी मानना है कि पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना था, लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों और सेना ने मिलकर इस्लाम के शासन को फेल कर दिया। बंगालियों, सिंधियों, बलूचियों और पश्तूनियों को अपनी अपनी आजादी की लड़ाई लडनी पड़ी। इसीलिए टीटीपी अब सिर्फ पख्तूनख्वा की बात नहीं करती। नूर वली ने अपने हाल ही के वीडियो में ‘आजाद बलूचिस्तान, ‘आजाद पश्तूनिस्तान और ‘सिंधु देश की मांग रखते हुए कहा है कि पाकिस्तानी सेना इन ‘राष्ट्रों के नागरिकों पर वैसे ही अत्याचार कर रही है, जैसे बंगालियों पर किए थे और बांग्लादेश बना।

उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश की तरह टीटीपी इन राष्ट्रों की जमीनों को सेना से मुक्त कराएगी। आजादी के बाद से पाकिस्तान भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। तो क्या भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से यह सही नहीं होगा कि वह पाकिस्तान के चार टुकड़े करने की मंशा रखने वाले दृष्टिकोण का समर्थन करे। जिस तरह 90 के दशक में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के कब्जे के दौरान अमेरिका की सीआईए ने अफगानी मुजाहिदों को पाकिस्तान में हथियारों की ट्रेनिग दी, हथियार और आर्थिक मदद दी, जिस तरह पाकिस्तान 90 के दशक से आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे कर कश्मीर भेज रहा है , उसी तरह आज भारत को बलूचिस्तान, पश्तूनिस्तान और सिंध देश की आजादी के लिए लड़ रहे इन इलाकों के नागरिकों को मदद देनी चाहिए और टीटीपी इन सबकी आजादी के लिए ही तो लड़़ रही है।

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